Madness…

Madness…😊😉😂😍😆

I asked myself one fine day, am I mad ?
Said a voice… a little, better than being sad,
Be a little mad !

Wishing to live in abandon and a will that is free,
Does it make me mad, maybe I am a nomad,
Who is mad !

Exploring risky pathways in the no man’s land,
Remembering the tinge of excitement it had,
Makes me mad.

Loved with heart ‘n soul ‘n wore heart on the sleeve,
If that’s called madness, agreed I am bad,
And I’m mad.

Writing emotions for the whole world to see,
People call me foolish, I am maybe a tad,
A wee bit mad.

I like to live life on my own term’s dearies,
I always did and now I am feeling so glad,
That I’m mad !

When the time comes to leave this illusion of life,
I will not have regrets that I didn’t try out any fad,
Including being mad!

Yes, I am a little mad…I am glad, I am a tad mad…
Yes, I am a little mad…
Better than being bad or sad…

Dr Namrata ‘Mad’ Kulkarni 😊😉😂😍😆
Bengaluru
29/01/17

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आज आज़ाद हूँ मैं…Aaj Azad Hoon Main…

आज आज़ाद हूँ मैं…
…A state of extreme emancipation…Is it possible…???

ना दुआ, ना इबादत करूँ,आज आज़ाद हूँ मैं,
ज़ख्मों से सूख गया ये लहू,आज आज़ाद हूँ मैं

मनायी है हिज्र में ईद भी मुहर्रम के मानिंद,
थम गये आँखों से ये आँसू,आज आज़ाद हूँ मैं

मिले चाक दर चाक ज़िगर पर कितने मगर,
फटे पैराहन का कर रफू, आज आज़ाद हूँ मैं

ना कोई उमंग, ना उठती मन में कोई तरंग,
छोड़ीं उम्मीदों की आरज़ू, आज आज़ाद हूँ मैं

सौंधी, गुमसुम, गुमराह, गुमनाम खुशबू जैसे,
इत्र के मानिंद मैं बिखरूँ, आज आज़ाद हूँ मैं

ढूंढता रहा गो हर ग़ाम, हर ड़गर, हर शहर,
खत्म हुई है यहाँ जुस्तजू, आज आज़ाद हूँ मैं

दुनिया के ग़म भुलाने, तोड़ दीये सारे पैमाने,
मैकदे में पहले की है वजू, आज आज़ाद हूँ मैं

या ख़ुदा, आज बिखरा दिये है तसबीह के दाने,
उन्हें समेटने की ना आरजू़,आज आज़ाद हूँ मैं

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
२४/०१/१७

An analysis of the above topic by my friend and philosopher Dr Aditya…

Nice creation Namrata

बुद्धत्व( spiritually enlightened ) को पहुंचा हुआ इंसान, कुछ इसी तरह के अपने विचारों को परिपक्वता तक पहुंचा कर, अपने भौतिक और आध्यात्मिक सफर को विराम देता है।

अब उसके लिये यह धरातल पर जीना, एक समय पसार करने के अलावा कुछ नही होता है।
वो अपने किरदारों को भली भांति और यथा शक्ति निभाते हुए अपना बचा हुआ जीवन व्यतीत करता है।
ना भौतिक जगत में कुछ चाह,
ना ही आध्यात्मिक जगत में कुछ खोजने की इच्छा।
सब पा लिया है, यह भावना।
मन शांत, ना कोई आरजू, ना कोई ज़ुस्तजू ।
एक गहरी शांति।
एक गहरे संतोष का अहेसास।
एक गहरी मुस्कुराहट, दुनिया के सामने और खुदा के सामने।
एक गहरा मौन।
ना कुछ सोचने की जरूरत।
ना कुछ बोलने की जरूरत।
ना कुछ करने की ख्वाइश।
सब कुछ भली भांति,
शांत शांत शांत
अपने अंतरात्मा का अहसास और अपने आप मे खुदा का दर्शन।
सनातन सुख, शांति, आनंद, प्रेम, पवित्रता, ज्ञान, शक्ति, उत्साह, उमंग, करुणा और संतोष की अनुभूति,
जो सिर्फ और सिर्फ महसूस की जा सकती है,
बयाँ नही।
वाह क्या अहेसास और क्या अनुभूति है !!!
निर्णायक अनुकंपा मालिक की अपने बंदे पर।
अंतिम छोर पर अनुग्रहित होना मौला की तरफ से।

इस अनुभूति के हम सभी हक्कदार है,अगर हम कोशिश करे तो,मालिक हम सभीको इस अवस्था पाने के लिये अनुग्रहित करे,यही दुआ करता हूँ।

सोचा ना था…Socha Na Tha…

सोचा ना था कभी इक़रार करेंगे तुमसे,
बेकरार होकर यूँ इज़हार करेंगे तुमसे

इन जज्बातों को न समझ पायें कभी,
फ़िर भी ना कोई तक़रार करेंगे तुमसे

दुनिया उछालती है कई सवाल हमसे,
उन्हें दफ़ना कर ऐतबार करेंगे तुमसे

तक़दीर में सोहबत ना मुमकिन मगर,
नक़ाबो के पीछे से दीदार करेंगे तुमसे

ना हासिल हुई हमे वाकिफ़ीयत तुम्हारी,
किसी जनम वस्ल ए क़रार करेंगे तुमसे

गो आज ये हक़ तुमने नही दिया है हमें,
कभी इश्क़ का इख़्तियार करेंगे तुमसे

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
२४/०२/१७

ऐ जिंदगी…Aye Jindagi…

Enjoy life as is, when is…Before it slips by… Just like your jindagi, your beloved may…

ऐ जिंदगी…

खिड़कीयों के झरोखों से झाक रहा हूँ,
तेरे कदमों की धीमी आहट सुन रहा हूँ,
ऐ जिंदगी, मैं तुझे दूर जाते देख रहा हूँ।

तू बड़ी खूबसूरत सी थी, मासूम भी थी,
तूने की बगावत, जज्बों को रोक रहा हूँ,
ऐ जिंदगी, मैं तुझे दूर जाते देख रहा हूँ।

दरीचे के वो चिलमन, धुंधलाते नज़र को,
तुझे नक़ाबो के झरोखों से ढूंढ रहा हूँ,
ऐ जिंदगी, मैं तुझे दूर जाते देख रहा हूँ।

धीरे से वो परदे लहराते बाद ए सबा में,
चश्मे कातील निगाहों को समझ रहा हूँ,
ऐ जिंदगी, मैं तुझे दूर जाते देख रहा हूँ।

टिप टिप बरस रहा यूँ बारिश का पानी,
पलकों पर सहमे अश्कों को बिंध रहा हूँ,
ऐ जिंदगी, मैं तुझे दूर जाते देख रहा हूँ।

खुद को रिझाने,मन बहलाने, तुझे भुलाने
कभी मैकदे, कभी दैरो हरम, जा रहा हूँ
ऐ जिंदगी, मैं तुझे दूर जाते देख रहा हूँ।

डॅा. नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
२३/०१/१७

तेरे मैकदे में…Tere Maikade Main…

your maikada… a bar…??? this world…??? Your perception…

तेरे मैकदे में…

शबे ग़म का फ़साना तेरे मैकदे में,
खुशी से यूँ मुस्कूराना तेरे मैकदे में,

जलाकर इक शमा शब ए हिज्र में,
लिखा पूरा अफसाना तेरे मैकदे में

पी लूँ साकी तेरी इश्क़ के जुस्तजू में,
सहबा ए ग़म का पैमाना तेरे मैकदे में

ऐ साकी क्यों मैं जाऊँ मेरे घर में,
जब पा लिया आशियाना तेरे मैकदे में

पी लेता हूँ इन आबगिनो से बेख़ुदी में,
गो इख़्तियार पहला क़रीना तेरे मैकदे में

लोग ख़ोजते है नाखुदा समंदरों में,
मुझे मिला मेरा सफीना तेरे मैकदे में

क्यूँ मैं ढूँढता फिरूँ दैर ओ हरम में,
तामीर करूँ इबादतखाना तेरे मैकदे में

शेख़ ढूँढे अपना ख़ुदा काबे कलिसों में,
मिला मुझे मेरा बूतखाना तेरे मैकदे में

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
२४/०१/१७

ये जरूरी नही मगर…Ye Jaroori Nahi Magar…

Lot of events occur in life where the end result is predictable…But not always…

ये जरूरी नही मगर…

आह को चाहिए ता उम्र होने असर, ये जरूरी मगर,
ऐ ग़ालिब, हर आह करे मुक्कमल असर, ये जरूरी नही मगर

आग़ोश ए सहर में निखरे क़मर, ये जरूरी मगर
शब ए रोज़ शमा करे दरखशां असर, ये जरूरी नही मगर

खंजर करते है जख़्म अकसर, ये जरूरी मगर,
हर ज़हर का ज़ालीम हो असर, ये जरूरी नहीं मगर

ज़फर होती यूँ मुकम्मल गुजर, ये जरूरी मगर,
हर अख़बार ए ख़बर हो ज़बर, ये जरूरी नहीं मगर

दुनिया ए नज़र ना हो बेखबर,ये जरूरी मगर,
बे इरादा होंगी मेरी बेदार नज़र, ये जरूरी नही मगर

दर ओ दर ख्वाब हो मयस्सर, ये जरूरी मगर,
हर सिकंदर बने बादशाह ए अकबर ये जरूरी नही मगर

मंझर में हो तेरी सांसों का अतर, ये जरूरी मगर,
तेरी यादों से दीदा ए तर बन जाये समंदर, ये जरूरी नही मगर

हर डगर की आख़िर हो बसर, ये जरूरी मगर,
हर अंजाम ए सफ़र हो तेरे ही शहर, ये जरूरी नहीं मगर

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
०९/०१/१६