इक शमा जलाये रखना…Ik Shamaa Jalaye Rakhana…Keep The Flame Of Hope Alive…

इक शमा जलाये रखना…

अंधेरी राह गर गुज़र गया,
इक शमा जलाये रखना
चिराग़ ए तूर गर बुझ गया,
इक शमा जलाये रखना

क़ातिब ने लिखी तक़दीर में पैहम आह ओ फुगान,
कुछ पा कर कुछ खोया, इक शमा जलाये रखना

राह मिलते सियाह बादल, कभी नूर ए हयात याँ,
गो न मिला शज़र का साया, इक शमा जलाये रखना

फ़राज़ ए अर्श से न देखा टूटता सितारा कभी,
न हो मुरादों से नामुराद मियाँ, इक शमा जलाये रखना

रहगुज़र मिले संग ए मोहतरम कभी संग ए मलामत,
कुछ ख़्वाब, चंद उम्मीदें याँ, इक शमा जलाये रखना

बे ख़बर थे अहल ए जहां होंगे मुन्हरिफ़ ग़ालिब,
धूवाँ सा फ़िजा, हाल न कर बयाँ, इक शमा जलाये रखना

दानिस्ता मिलोगे संग ए आस्तां पर जब ‘हया’ से,
अगर वो मिलने भी न आया, इक शमा जलाये रखना

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
२१/०५/१७

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अपनी सुनाओ कैसे हो… Apni Sunao Kaise Ho…

अपनी सुनाओ कैसे हो…

मुद्दतों बाद मिले हो, आज अपनी सुनाओ कैसे हो
वो भूली दास्ताँ की कहानी, सुनाओ कैसे हो

अहल ए जहाँ से कई फ़साने सुने है तेरे हम ने,
नयी कहानी अपनी जुबानी, सुनाओ कैसे हो

गुजारे है माह ओ साल इंतज़ार में जो तेरे हमने,
तुम क्या जानो ये नातवानी, सुनाओ कैसे हो

गुलों की खूबसूरती सुना है काँटों से होती है,
याँ तूने दी जो ज़िगर की निशानी, सुनाओ कैसे हो

प्यार तुमसे किया था हमने, ये थी हमारी नादानी,
अब संवर चुकी मेरी जिंदगानी, सुनाओ कैसे हो

कोई इश्क़ ना करे किसीसे, होती है परेशानी,
क्या कह पाओगे ये किस्सा आसानी, सुनाओ कैसे हो

खामोशी की गुफ़्तगू, क्या सुनोगे दास्ताँ हमारी,
क्यूँ ये ज़ुबान बनी अब बे जुबानी सुनाओ कैसे हो

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
०३/०५/१७

हसरतें…Hasratein…

हसरतें…

दाना थे, गो लोग कहें नादान हमें,
कोई तो शक़्स कहे इन्सान हमें

गोया बेचने ईमान खड़े बाज़ारों में,
कहते अहल ए जहाँ बेईमान हमें

कभी भिगोना कैफ़ की बारीश में,
काँटों का ना यूँ बनाना निशान हमें

उलझनों में फंसी है जिंदगी इतनी,
तू गर मेहरबान, जीना आसान हमें

अर्ज इतना, बन जाओ निगहबान,
कर दो बस इतना तुम एहसान हमें

ऐ साकिया,तू तो मगर पहचान हमें,
बस इतनी हसरत है के तू जान हमें

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
३०/०५/१७

Painting by Ilayaraja is only for depicting the emotions of the poem, no copyright violation intended.

दुआ…रमज़ान मुबारक़…Dua…Ramazan Mubarak…

दुआ…

माहताब छुपा बैठा है सितारों के काफिलों में,
याँ नमाज़ी चले रखने रोजे ख़ुदा की महफिलों में

इबादत से मांगते है दुआ सलामती की ऐ मौला,
कुबूल कर दे उन्हें रमज़ानी माह ओ सालों में

चाँद उतरा फलक से, चाँदनी की आराइश लिए,
हो रही इफ्तार की तैयारी
दुआओं से क़बीलों में

गुलों ने गुलफ़ाम, सितारों ने सलाम भेजा है जनाब,
मुबारक़ बात देते इस रमज़ान हम सबको पैग़ामों में

बरसे आलम में बरकत ओ रहमत की बरसातें,
पैहम चले खुशियों का सिलसिला सब के दिलों में

माफ कर मेरी खता, बख्श दे थोड़ी सी अता,
ज़ुस्तजू इक बूँद के तिश्नगी की इन बादलों में

आलम तरसे चाँद के दीदार को आसमानों में,
हमको होश कहाँ है, खो गए जो तेरे ख़यालों में

तेरे दीदार पर ख़त्म होंगे रोज़े लब ए बे सवालों में,
मनायेंगे ईद उल फितर न उलझा तू अब बवालों में

NK
६/६/१८

आते हो…चुनरी ओढ़े…Aate Ho… Chunari Odhe…

आते हो…चुनरी ओढ़े…

आते हो नीले आसमानी बादलों की चुनरी ओढ़े,
कभी आया करो नीम-शब, दरख्शांयी सितारों की चुनरी ओढ़े

मैंने पलकों पर सैल ए ख़यालात सजा रखे है,
तू गर ख़्वाबों में आये, तो आना सपनों की चुनरी ओढ़े

गिरते है ये आँसू, बेवज़ह तेरे दीदार की याद में,
समेटें रखता हूँ सीपियों में इन्हें, पलकों की चुनरी ओढ़े

क्यों आ आ कर सताते हो शब ओ सहर मुझे यूँ,
आना बस एक बार खयालातों में, यादों की चुनरी ओढ़े

मेरे कश्ती को मिला था साहिल तेरे बादबानों से,
डरता हूँ अब इस समंदर से, जो है लहरों की चुनरी ओढ़े

हर सिम्त, ता हद्द ए नज़र ढूँढता रहा चरागों को,
देखूँ तुम्हें कैसे, गर आये तुम घूँघट में, फूलों की चुनरी ओढ़े

ता उम्र कदमों की आहट आती रही रहगुज़र,
तुम ना आये, गो आयी तुम्हारी यादें सन्नाटों की चुनरी ओढ़े

आयी ‘हया’ से सहर, बाद ए नसीम की चुनरी ओढ़े
शब ए इन्तेज़ार भी गुज़री, क़ब्र पर नकाबों की चुनरी ओढ़े

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
२८/०५/१७

(Image used for representational purposes only, no copy right intended.)

कुछ याद रहे, कुछ भूल गये…

कुछ याद रहे, कुछ भूल गये…

फ़िर छेड़े दिल ने तराने, कुछ याद रहे, कुछ भूल गये
याद आये चंद फ़साने पुराने, कुछ याद रहे, कुछ भूल गये

आते थे छत पर अब्र के मानिंद, सियाह ज़ुल्फ़ बिखराते,
मुझसे गुफ़्तगू करने के बहाने, कुछ याद रहे, कुछ भूल गये

नीले आसमानी आंगन में, सरापा चाँदनी की ओढनी समेटे,
उस माहरुख़ के नज़ारे सुहाने, कुछ याद रहे, कुछ भूल गये

बाम ए फ़लक से माहताब उतरे, सितारों की महफ़िल से,
खनक ए पाज़ेब लगे अनजाने, कुछ याद रहे, कुछ भूल गए

तेरी निगाह ए शोख़, जो करती थी कभी घायल मुझे,
नशीले सुर्ख़ लबों के पैमाने, कुछ याद रहे, कुछ भूल गये

डोली में सेहरा उठा कर, देखा नज़रे मिलाकर तुमने,
आँखों में अश्क़ों के आईने, कुछ याद रहे, कुछ भूल गये

लिखें हमने भी कई नग़्मे, भूली उल्फ़त के फ़साने,
भूली बिसरी बातों के अफ़साने, कुछ याद रहे, कुछ भूल गये

बन बन के हम दीवाने, आये है साक़ीया इस मैखाने,
तेरी यादों को फ़िर भुलाने, कुछ याद रहे, कुछ भूल गये

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
२५/०५/१७

Image is used only for representation of the emotions of the gazal, no copyright intended.

मैं और तू…Main Aur Tu…

मैं साँसों की दम कशी, तू आरजू ए तमन्नाओं की मदहोशी,
मैं हूँ तेरे दिल की धड़कन, तू मेरे रूह की पुर जोशी

मैं सहरा की तिश्नगी,तू मेरे ज़ुस्तजू की प्यास,
मैं दश्त ए मुश्त ए ख़ाक, तू उन सराबों की आस

मैं हूँ गुलों गुलफ़ाम, तू है मेरे खुशबूओं की महक,
मैं हूँ भँवरे की गुनगुन, तू जैसे बुलबुल की चहक

मैं हूँ परवाने की चाहत, तू है कसक शमा की,
मैं जुगनू सा अदना उजाला, तू सुकून दिए की

मैं बादल हूँ आवारा, तू बरखा की नसीम झलक,
मैं काली घटा का अंधेरा, तू बिजली की सिसक

मैं माहताब तेरे आंगन, तू चाँदनी की मुसकान,
मैं आफ़ताब हूँ सुनसान, तू फ़लक सा आसमान

मैं समंदर की बेताब लहरें, तू सेहरा साहिल का,
मैं दरिया में कश्ती, तू जुनून उन बादबानों का

मैं रूठा हुआ नग़मा, तू मेरा तरन्नुम ए साज़,
मैं तेरी आशिक़ी, तू रूदाद ए मोहब्बत ए परवाज़

मैं साग़र जिसका ना पैमाना, तू मैक़दे की बेक़रारी,
तेरे मैखाने करूँ नशा साक़िया, तू मेरी बेख़ुदी की खुमारी

मैं मयकदे की मयकशी, तू मेरी साग़र ए मयनोशी,
तुझे ढूँढूँ हर सिम्त, तू ता हद्द ए नज़र गूँजती खामोशी

मैं तेरा मर्ज़ ए इश्क़, तू मेरी हर बीमारी का इलाज़,
मैं करूँ इबादत से दुआ, तू मेरी आयत, मेरी अज़ान, मेरी नमाज़

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरू
२१/०५/१७

My good friend, philosopher and guide Dr Hitesh Adatiya has given his sufi interpretation of this nazm…

29/04, 07:30🙏🏻🌻🙏🏻🌻🙏🏻🌻🙏🏻🌻

तू मेरी आयात, मेरी अजान,मेरी नमाज।

खुदा माशूक और ग़ज़ल कार माशूका।
खुदा का नाम ही दुआ,खुदा का नाम ही आयात।
खुदा का नाम ही अजान,खुदा के नाम से ही नमाज शुरू और उसीके नाम पे खत्म।
खुदा का नाम ही उसकी बन्दगी,खुदा का नाम ही इबादत।
खुदा के नाम से ही सुबह,उसीके नाम की शाम और उसी के नाम से शब आखेर।
खुदा का नाम ही उसकी प्रार्थना,खुदा का नाम ही शुक्राना।

खुदा से मोहब्बत की भावना से भावित इंसान सूफी कहेलाता हैं।

इस सूफी गझलकार को दिलसे से सलाम और रूहानी सजदा।

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29/04, 07:45

खुदा से इस प्रकार की मोहब्बत को उर्दू में सूफी तो हिन्दू आध्यात्मिक दार्शनिकता के नजरिये से गोपिभाव कहेते है।

सूफी भाव और गोपिभाव को आध्यात्मिक दार्शनिकता में अव्वल दर्जा दिया गया है।

इसी को भगवत गीता में अव्यभिचारिणी भक्ति का नाम दिया गया है जो इंसान को आध्यात्मिकता की परमसीमा तक पहुचने का सरल तरीका बताया गया है।

इस नायाब रचना के लिये आप को फिर एकबार दिलसे सलाम और शुक्रिया।

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आख़िरी पैगाम…ख़ुदा हाफिज़…A Point Of No Return…

आख़िरी पैग़ाम…A point of no return…

जब किसी से मिलों गलियों में, हिज़ाब रखना,
झाँक कर ना देखे कोई, आरिज़ ओ लबों पे नक़ाब रखना

तुम बस मेरी थी, और मेरी ही बनकर रहना,
ये ख़यालात हमेशा याद, तुम मेरे ज़नाब रखना

दुश्मनों की नही है कोई कमी इस दुनिया में,
कौन रक़ीब और कौन हबीब इसका हिसाब रखना

इस अफ़साने में अब ना होंगी मुख़्तसर मुलाकातें,
यादों के सफ़हे मोड़ने, लिखकर इक किताब रखना

शब ए वस्ल अब ना होंगी पैकर हकीकतों में,
दिनो को शादाब-नुमा बनाने का हसीन ख़्वाब रखना

जमाना पूछेगा मेरे बारे में कई सवालात तुमसे,
जरा सोच लेना, तैयार जरूर कोई जवाब रखना

न हुई अब जो पैकर, अगले जनम मेरे जनाब,
ये हसरतें, ख़्वाबिदा ख़यालातें, ये ख्वाइशें बेहिसाब रखना

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरू
१७/०५/१७

आईना ए रूखसार… Aaiena E Rukh saar…

आईना ए रूखसार…

ऐ जिंदगी, तुझको मैंने बहुत करीब से जाना है,
लेकिन तू मुझे जान ना पायी ये तूने भी माना है

चेहरे पर अब झुर्रियों की मासूम आती शिकन,
कहकहे लगा छुपा लूँ तो दुनिया कहती दीवाना है

शब ए रोज़ देखती हो मुझे बेख़ुदी के मंज़र में,
दो घूंट पी लूँ फिर खुशियों का ना कोई पैमाना है

पलकों की कतारों में असीर है ये बेबस आँसू,
आस्तीन से पोछ लेता हूँ, रूह में झाँकने का आईना है

इन कपकपाते लबों पर जो लगायी है तूने मोहर,
आईना ए रुख़सार करें बयान इन में छुपा अफसाना है

नसीम ए सुबह में लहराते सफ़ेद दाढ़ी ओ ज़ुल्फ़,
क्यूँ लगे दुनिया को इस दिल में उठा कोई तराना है

तू लाख करे कोशिश मेरे रूह को जानने की,
हर सिम्त से गूंजती मेरी खामोशी तुझे समझाना है

ऐ जिंदगी, तूने मुझे ना जाना, ना ही पहचाना है,
उठायेगी कफ़न तब होगा एहसास ये शक़्स कितना अंजाना है

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
१५/०५/१७

कोई गिला नही…Koi Gila Nahi…

कोई गिला नही…

तू ख़ार ख़ार है, हम ज़ख्म ज़ख्म हुए, कोई गिला नही,
ज़ख्म ए निहाँ पर मरहम गर न लगाये, कोई गिला नही

दिल को दिये चाक दर चाक, जुलाहा था तू जिगर,
बिखरे काँटे समेट कर खामोश लब सिलाये, कोई गिला नही

गुनाह ए मुहब्बत की, ता उम्र बन बैठे गुनहगार हम,
अब तू या गैर भी हमें फाँसी चढ़ाये, कोई गिला नही

तेरे हम-बज़्म ने बेसबब क़सूरवार साबित किया हमें,
खड़े है कटघरे में कोई भी सज़ा सुनाये,कोई गिला नही

साथ तेरे, इस शहर का हर शक़्स बन बैठा है मुंसिफ़,
मुद्दई किस अदालत के दर खटखटाये, कोई गिला नही

गो तुझे माफ कर दिया है हमने, ज़हर पी पी कर,
आब ए मुकद्दस भी बहुत है पिये, कोई गिला नही

निकल पड़े थे रहगुजर, सू ए दर ए यार की ज़ुस्तजू में,
सामने गर दिखे सर ए दार, मौत के साये, कोई गिला नही

उठा अब ईमान का ये नक़ाब तेरे रुख़सार से ऐ जालीम,
यहाँ भी अगर हम काफ़िर सनम पाये, कोई गिला नही

मुख़्तसर पलों में मिले कई लम्हे यादगार अक्सर,
ऐ जिंदगी तुझको बहुत है जिये, कोई गिला नही

आ बैठे है तेरे दर पर ऐ खुदा, बड़ी ‘हया’ से हम,
अब कब्र से गर तू कफ़न भी उठाये, कोई गिला नही

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरू
१०/०४/१८