नक़ाबों के पीछे से…Naqaabon Ke Peeche Se…

Every veil secretly desires to be lifted, except the veil of Hypocrisy…

Every woman in all cultures wears one knowingly or unknowingly…seen or unseen…

नक़ाबों के पीछे से…

रोज़ देखूँ दुनिया चमकती नक़ाबों के पीछे से,
चश्म ए नम से गुज़रती देखती, नक़ाबों के पीछे से

लबों की लरझिश, हल्की इक आह निकले,
हुआ दीदार ए यार तो शरमाती, नक़ाबों के पीछे से

आँखों की सीपियों से गौहर झलकते है कभी,
हलके हाथों से पिरोया करती, नक़ाबों के पीछे से

मन करता है मेरा चिलमन उड़े बाद ए सबा में,
गो ग़म ए हस्ती को छुपाती नक़ाबों के पीछे से

मेरे अरमान, ख्वाबों ख़यालात,लिखे नग़मात,
कैफ़ की बरसात मुझे भिगोती, नक़ाबों के पीछे से

लूँ मैं भी आज़ादी की साँसे किसी इक दिन,
घुटन मुझे भी कभी है होती, नक़ाबों के पीछे से

शरम, लिहाज़, “हया” रखा करो कहते वाईज़,
क्या ये सब अछूत ही रहती, नक़ाबों के पीछे से ?

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
२३/०४/१७

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आज आज़ाद हूँ मैं…Aaj Azaad Hoon Main…

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं🙏🏻🇮🇳 आज आज़ाद हूँ मैं…

ना मैं हिन्दू,ना मैं मुसलमान, आज आज़ाद हूँ मैं,
ना कोई धरम, यही मेरा इमान, आज आज़ाद हूँ मैं।

कई बरसों पहले कफ़स में हुआ था मैं बेजान,
फिर न जकड़ तू मुझे इन्सान, आज आज़ाद हूँ मैं।

भगतसिंह,राजगुरु,सुखदेव के लहू का एहसान,
न चाहिए अब कोई कद्रदान, आज आज़ाद हूँ मैं।

बंद करो दंगे फ़साद, मज़हब के नाम इन्कलाब
बस इतने हो जाओ मेहरबान, आज आज़ाद हूँ मैं।

ज़कत है सिखाना, न करो अबला का अपमान,
यही है मेरा अब से अरमान, आज आज़ाद हूँ मैं।

आज़ादी की सांस मुझे लेने दो,मुझे भी जीने दो,
ना लो अब मेरा यूँ इम्तीहान, आज आज़ाद हूँ मैं।

NK

इक शब …इक मुलाक़ात…Ik Shab…Ik Mulakaat…

इक शब …इक मुलाक़ात…

गुज़र रहे थे माह ओ साल जिंदगी के क़रीब से,

क्या लिखा सफहों पर पूछूँ मेरे मुक़द्दर ए कातिब से

मिले किस्मत से इक शब, जो गुजरी अजीब से,

सामने बैठे थे वो, करते बातें रब्त की करीब से

वो सिलसिला जो था ही नहीं, गो भुलाते कैसे,

पुरानी हसरतें मुद्दतों बाद सामने खड़ी थीं नसीब से

देखे उनको एक जमाना गुजर गया था जैसे,

रिश्ता कैसा ये, लगने लगे रकीब भी हबीब से,

नग़्मों के साग़र ए ज़ाम का नशा चढ़ा ऐसे,

भूला ना पाये वस्ल ए यार ए शब,जो थी अजीब से

डॅा नम्रता कुलकर्णी

बेंगलुरु

१५/०३/१७

Picture depicted only for purpose of expression of emotions, no copyright intended.

In Your Dreams…

In your dreams…

Though far away n lost I may seem,
Y’ll find me in the world of your dreams.

Like the waves floating on the stream,
Riding the serene rivulets of the moonbeam.

Shining in the sky of hope n’ gleam,
Amongst the dazzling rays of the sunbeam.

The touch of my warm breath’s steam,
Caressing your cheek like soft winter cream.

Lingering fragrances they may seem,
Will fill your heart till it bursts at it’s seams.

Walking on the rainbow searching for me,
Your twinkling guiding star in God’s scheme.

Our love’s surely like a fairy-tale theme,
Bubbling with emotions filled to the brim.

Though it may seem to you like a daydream,
I’ll always be somewhere within your dreams.

Dr Namrata Kulkarni
Bangalore
21/03/17

दे दो साहिब…De Do Saahib…

दे दो साहिब…

मिरे वजूद की निशानी दे दो साहिब,
हर सिम्त अब्र सियाही, ताबानी दे दो साहिब

उम्र की दहलीज़ पर हुए है दाना,
फ़िर मुझे बचपन की वो नादानी दे दो साहिब

जिंदगी में है पशेमानी ओ वीरानी,
लुत्फ़ उठता चलूँ, मुझे जिंदगानी दे दो साहिब

ना दिखे मिरे इश्क़ की नातवानी,
मुझे मिरी मोहब्बत की दरबानी दे दो साहिब

प्यार में याँ लगती दिल पे निशानी,
मिरे ज़ीगर की मुझे निग़हबानी दे दो साहिब

तुम करो बस इतनी सी मेहरबानी,
समेटकर खुशी, हमें बेपरेशानी दे दो साहिब

बिखरी दूरतक जो निले आसमानी,
ऐ चाँद, तुम्हारी सुहानी चाँदनी दे दो साहिब

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
१४/०३/१७

रंग प्रेमाचे…Rang Premache…

थोडासा रूमानी हो जाये …

रंग प्रेमाचे…

तुझ्या रंगात रंगले मी,
नात्यात ह्या गुंतले मी।
भरले प्रीतीचे रंग तुझे,
माझ्या श्वेत तसबीरीत मी।

मेंदीच्या पानांनी रंगली,
हातावर लाली ही सजली।
करी मंजुळ नाद मनगटी,
हिरवा चुडा भरलेला मी।

विड्याचे पान गालात,
ओठावर उमले गुलाली।
काळ्या भोर मेघ केशातून,
चांदणी फुले माळीली मी।

बकुळीहार निळकंठी,
डोले पलशाची कर्णफूली।
रंगात रंगवूनी मज तू,
रंगून झाली पितांबरी मी।

श्वेतांबरी मी होती कधी,
सप्तरंगी इंद्रधनु झाले मी।
तुझ्या प्रेम रंगात रंगूनी,
रंग उधळीत गेले मी,
मलाच विसरूनी गेले मी।

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
१३/०३/१७

Disclaimer: the picture used is one of Raja Ravi Verma paintings, solely for the purpose of depicting the emotions. No copy right intended.

बस इतना कर दो…Bas Itna Kar Do…

बस इतना कर दो…

मैं हूँ इक उलझा अदना सा लम्हा,
तुम मेरे रूठे हालात को सुलझा दो

कोरे सफ़हे पर खामोशीयाँ लिखी,
तुम इन्हें अपने अल्फ़ाजों में सुना दो

एहसासों के नग़्में जो बयाँ है किये,
उन्हें तरन्नुम का सरताज़ तो चढ़ा दो

मेरी ख्वाईशें जो जुड़ी है तुमसे,
इन खयालातों को मुकम्मल करा दो

खाली चौखट सी तसवीर जिंदगी,
चुनिन्दा उमंगों के रंगों से खिला दो

कई सवाल उभर आते हैं मन में,
सवालातों के जवाबों का सिला दो

शुरू होती है मेरी जिंदगी तुम से,
मेरी मौत तुम्हारे आगोश में छुपा दो

मेरे जाने पर ना रोना कभी तुम,
गो इस लाश पर इक कफ़न चढ़ा दो

रूहानीयत से सजदा करें हम,
इस रूह को अपने रूह में मिला दो

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
११/०३/१७

अपना पराया…Apna Paraya…

किसे मैं अपना और किसे पराया समझूँ,
समझूँ किसे अंधेरा और किसे दिया समझूँ ?

कोई दिखे क़ातील,किसे मसीहा समझूँ,
मिलती धूप, किसे सुकून की छाया समझूँ ?

कई दोस्त बन बैठे मुख़ालीफ़, कैसे मैं सहूँ,
तू बता, तुझे हबीब या रक़ीब, क्या समझूँ ?

जो लगता था वहम, बन गया है हकीकत,
एतबार ओ बे एतबारी का भूल भूलैया समझूँ

शमा में जलकर तबाही में जलता परवाना,
नासमझ हूँ जो उसे दरखशां या ज़िया समझूँ

कोशिश करूँ तुझे समझने की, ऐ ग़ालिब,
ना समझ पाऊँ तेरी जुबान, इसे मेरी हया समझूँ

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
०५/०३/१७

पागलखाना…एक नयाअंदाज़ …

Recently I came across an interesting type of gazal wherein each sher was in two languages, but the meter, meaning, kaafia, raadif etc was maintained.

This is an effort on my part to recreate that type of gazal…

पागलख़ाना…

ये दुनिया लगे है जैसे इक पागलख़ाना,
मानवा तू काय जगलास जर हे गुपीत जाणले ना

वाईज़ ओ शेख़ समझ ना पाये ज़माना,
समझदारच जाणे अन म्हणतो यासी पागल खाना

लिख गये वो जनाब फ़ाज़ली ये फ़साना,
म्हणुनी गेले ही दुनिया तर जादूचे खेळणे आहे ना

है यहाँ हर शख्स अजीब सा अनजाना,
घातले सर्वांनी मुखवटे, खरा चेहरा कुठेची दिसेना

ना टूटे किसी का ज़मीर, यही है माना,
विस्कटलेल्या तूकड्यांना जोडतो साकी तुझा घराना

बुतपरस्त होकर ना है मुझे अब जीना,
निष्ठूर रे मानवा तू अंतर्मनात कधीतरी झाक ना

कहूँ इसे बुतखाना,खिलौना या मैखाना,
दुनिये तुझ्या शिल्पकाराला देखील समजेना

न कोई मुझसा मस्तमौला, मुझ में थी अना,
बघूनी विश्वरूप तुझे, नतमस्तक मी तव चरणा