तेरे माथे पर बिंदिया का…Tere Mathe Par Bindiya Ka…

Have a romantic Valentine’s day💖💞💕❤…

तेरे माथे पर बिंदिया का ताब चमके,
जैसे रुख़सार ए आसमान पे आफ़ताब चमके

तेरा हुस्न ए नूर बहुत लाजवाब साकी,
आरिज़ ए गुल पे तिल, ज़र ए नक़ाब चमके

ज़ुल्फ़ ए सियाह का चिलमन जब उठे,
उन घने बादलों में चांदनी का माहताब चमके

सीपियों के पंखुड़ियों में निखरे गौहर,
शबनमी होठों पर आँसूओं का आब चमके

दरिया में डूब जाऊँ, या बचा ले मुझको,
ये गहरे समंदर निगाह ए शोख़ बेताब चमके

तुझे देख कर न रहे खुशियों का पैमाना,
चश्म ए नम से गिरते आँसू बेहिसाब चमके

तू दिखे रु ब रु, या बेख़ुदी के ख़यालों में,
तेरा अक्स जब छलके, जाम ए शराब चमके

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु

Advertisements

मौला के बंदे…Maula Ke Bande…

मौला के बंदे…

बेख़ुदी में पीते अक्सीर ए हयात की बूंदे,
मिले जब तेरे बज़्म ऐ साकी, कहलाते हम रिंदे

ना है धरम ओ ईमान, ना ही कोई मज़हब,
आज़ादी के नशे में सरहद से परे उड़ते हुए परिंदे

ज़ाहिद निकलता दर ए मस्ज़िद से नमाज़ी हो कर,
जब हम निकले ख़राबात से, लोग कहते दरिंदे

कभी इज्ज़त ना दी इस ज़ालिम ज़माने ने,
फ़िर भी करें एहतराम सबका, ना कहो हमें चरिंदे

रहते नज़्म ओ शायरी की दुनिया में मक़फूल,
कूचे गलीयों में, शहरो आलम के पोशीदा बाशिंदे

ना इरादें, ना उमंगे, ना है ख़फ़ीफ उम्मीदें,
तवक्कों से हुए बरबाद, कहो हमें मौला के बंदे

शर्म, ‘हया’, लिहाज़ रखो बतलाये वाईज़,
पीते ग़म भुलाने को, क्यूँ कहलाये शर्मिन्दे

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु, २६/०४/१७

Disclaimer:

Image used only for purpose of representing the feel of the gazal, no intention of copyright intended.

नक़ाबों के पीछे से…Naqaabon Ke Peeche Se…

Every veil secretly desires to be lifted, except the veil of Hypocrisy…

Every woman in all cultures wears one knowingly or unknowingly…seen or unseen…

नक़ाबों के पीछे से…

रोज़ देखूँ दुनिया चमकती नक़ाबों के पीछे से,
चश्म ए नम से गुज़रती देखती, नक़ाबों के पीछे से

लबों की लरझिश, हल्की इक आह निकले,
हुआ दीदार ए यार तो शरमाती, नक़ाबों के पीछे से

आँखों की सीपियों से गौहर झलकते है कभी,
हलके हाथों से पिरोया करती, नक़ाबों के पीछे से

मन करता है मेरा चिलमन उड़े बाद ए सबा में,
गो ग़म ए हस्ती को छुपाती नक़ाबों के पीछे से

मेरे अरमान, ख्वाबों ख़यालात,लिखे नग़मात,
कैफ़ की बरसात मुझे भिगोती, नक़ाबों के पीछे से

लूँ मैं भी आज़ादी की साँसे किसी इक दिन,
घुटन मुझे भी कभी है होती, नक़ाबों के पीछे से

शरम, लिहाज़, “हया” रखा करो कहते वाईज़,
क्या ये सब अछूत ही रहती, नक़ाबों के पीछे से ?

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
२३/०४/१७

आज आज़ाद हूँ मैं…Aaj Azaad Hoon Main…

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं🙏🏻🇮🇳 आज आज़ाद हूँ मैं…

ना मैं हिन्दू,ना मैं मुसलमान, आज आज़ाद हूँ मैं,
ना कोई धरम, यही मेरा इमान, आज आज़ाद हूँ मैं।

कई बरसों पहले कफ़स में हुआ था मैं बेजान,
फिर न जकड़ तू मुझे इन्सान, आज आज़ाद हूँ मैं।

भगतसिंह,राजगुरु,सुखदेव के लहू का एहसान,
न चाहिए अब कोई कद्रदान, आज आज़ाद हूँ मैं।

बंद करो दंगे फ़साद, मज़हब के नाम इन्कलाब
बस इतने हो जाओ मेहरबान, आज आज़ाद हूँ मैं।

ज़कत है सिखाना, न करो अबला का अपमान,
यही है मेरा अब से अरमान, आज आज़ाद हूँ मैं।

आज़ादी की सांस मुझे लेने दो,मुझे भी जीने दो,
ना लो अब मेरा यूँ इम्तीहान, आज आज़ाद हूँ मैं।

NK

दरमियान…Darmiyan…

दरमियान…

दरमियान ए ख़याल ओ आवाज़ हो रहा बसर मेरा,
पक गया है फ़ल शायद मेरे जिंदगी के शजर मेरा

सुबह ओ मासा दिये आवाज़ ए ख़ामोश ए ज़मीर,
इबादतों जुनून में किये सज़दे न मीला मुझे समर मेरा

गुजर रही है शाम ए जिंदगी, हो कर यूँ सरशर,
मैं नशे में, नशा मय में, मय से भरा है साग़र मेरा

कश्मकश है याँ दिन बा दिन अक़्ल ओ जुनूँ की,
ऐतबार ओ बे ऐतबारी में उलझता मुक़द्दर मेरा

दरमियान ए वजूद ओ अदम रहता शब ओ सहर,
शहर भी छोड़ आया हूँ साकी, तेरा संग ए दर मेरा

मेरे अतराफ़ को कर तेरे जमाल ए नूर से रोशन,
हो हर सिम्त उजाला, ख्वाईश ओ इज़हार मेरा

तेरे ज़मीन पे ज़ुर्रत करती लिखने की ऐ ग़ालिब,
बन पाऊँ शायर सुख़नवर ये इक़रार, अकसर मेरा

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
२१/०४/१७

In between…

I continue to exist between my thoughts and voice,
Probably I have (fruit of the tree of my life has matured) reached a ripe old age in life.

Morning and evening praying with the silent voice of my soul,
Praying zealously without hope of rewards on the whole

Now the evening of life goes by in a state of intoxication,
I am drunk due to the wine in my glass of inebriation
(drunk with wine of devotion towards almighty)

Daily there is a fight between sense and senselessness,
When my destiny fluctuates between belief n’ hopelessness

I am living between state of existence and nonexistence,
Came to you saaqi(god) for shelter, from afar distance

Illuminate my surroundings with the beautiful brilliance of your light,
My last wish and request to make my world bright

I dare to write in your birthland O ghalib, the great,
Determined and hoping to become an eloquent poet.

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
२१/०४/१७

बिखरे तसबीह के दाने…Bikhare Tasbeeh Ke Daane…

बिखरे तसबीह के दाने…

खड़ी पलकों के पीछे, अश्क़ों की ये क़तारें,
टीप् टिप बरस कर बिखरे रुख़सार से परे,
जैसे तसबीह के दाने…

गोते लगाकर समेटती जिन्हें दरिया की आगोश में लहरें,
सीपियों के गौहर ए शफ़्फ़ाफ़ समंदरों में बिखरे,
जैसे तसबीह के दाने…

डूब गया आफ़ताब जब दूर उफ़क के किनारे,
टूटकर बिखरे नीले आसमानी बादलों में सितारे,
जैसे तसबीह के दाने…

पेड़ों की शाखों ने ओढ़ ली पत्तों की चादरें,
गुलों पर शबनम के दिखे बिखरे हुए क़तरे,
जैसे तसबीह के दाने…

नज़र ढूँढे दश्त दर दश्त सराबों के नजारे,
मुश्त ए ख़ाक ए सहरा में बीते लम्हों के टुकरे,
जैसे तसबीह के दाने…

अब ना समेटूँ उन्हें, करूँ इबादत दिल में मिरे,
ढूँढ़कर सजदे की वजह बेशुमार, आस्तान पे तेरे,
जैसे तसबीह के दाने…

बिखरने दो तसबीह को, तोड़ दो जुन्नार मिरे,
मोहोब्बत ओ जुनून में किये इबादत
ता उम्र बा हजाराँ तेरे,
जैसे तसबीह के दाने…

ऐ खुदा, समेट लेना तू इन बेबस मुरादों को मिरे,
बिंध कर पिरोदे मिरे जज़बात जो हर सिम्त है बिखरे,
जैसे तसबीह के दाने…

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु

इस गली…Is Gali…

reminiscences of a bygone era…

इस गली…

तेरे हुस्न के देखे थे लाखों दीवाने इस गली,
इक शमा नज़र में,जले थे कई परवाने इस गली

याद है, बैठा किये थे उस बरगद की छाँव में,
पेड़ ना रहे, पीछे रह गए अफ़साने इस गली

ना रहा वो नुक्कड़, ना रहे वो आशियाने,
हो गये सब ख़ाक, जो भी थे पुराने इस गली

अब ना है इक धरम, ना किसीका इमान,
ता हद्द ए नज़र खाली दिखे बुतखाने इस गली

दिखे मस्ज़िद ए वीरान, तकब्बुर मीनारें रोती हुई,
वक़्त की शाख पे जैसे ठहरे हो जमाने इस गली

मेरी प्यास अब ना बुझेगी इक पैमाने से साक़ी,
ख्वाइश है हर कूचे पर हो कई मैखाने इस गली

कुछ ना रहा है देखने, ना रहा कुछ समझने,
बन गए है अब तो हम भी अनजाने इस गली

हुई इक मुद्दत के तू गुज़र गया है ग़ालिब,
गूंजते तेरे लफ्ज़ आज भी जाने पहचाने इस गली

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरू
१७/०४/१७

तकब्बुर proud

जुनून ए मुहब्बत…तू…Junoon E Muhabbat…Tu…

जुनून ए मुहब्बत…💕
तू…

तू है अज़ान, तू ही वजू, तू ही इबादत मिरी,
तू है दुआ, तू ही सजा, तू ही है आयात मिरी

तू है ताबीज़, तू ही तसबीह, तू मिली सौग़ात,
तू खयालात, तू जज़्बात,बन गयी नग़मात मिरी

तू किस्मत, ना दिया खैरात, तू ही कायनात,
तू फ़िजा, तू समा, तुम हो गयी हो हयात मिरी

तू है हश्र, तू मुलाकात, मेरी यादों की बारात,
तू तिश्नगी, तू ही बरक़त, तू ही है बरसात मिरी

तू नज़ाकत, तू कयामत, तू ही मिरी रिवायत,
तू मोहब्बत, मिरी ज़रूरत, इक हसीन रात मिरी

तू क़ुदरत,मेरी फ़ुरसत, हो तुम इल्तिफ़ात,
तू इज्ज़त, तू ही फ़ितरत, बन गयी आदत मिरी

मोहब्बत बन गयी बन्दगी, क्यों करे शिकायत,
ना कर अब रक़ाबत, तू है खुदा की रहमत मिरी

तू है मेरी बग़ावत, मेरी जिन्दगी की गफ़लत,
तू बन गयी अल्लाह की इनायत, कहूँ बात मिरी

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
१६/०४/१७

जिंदगी की तेज रफ़्तार में…Jindagi Ki Tej Raftar Main…

Good morning😊…When life throws brick bracks at you…Build a house… enjoy my perception of life and society.. .

जिंदगी की तेज़ रफ़्तार में, कदम आहिस्ता रखना,
अपने नुत्का-चीनों से नाता तू दानिस्ता रखना

जब नज़र आये हर सिम्त घोर घने अंधेरे बादल,
घर के किसी कोने में एक दिया जलता रखना

हर गाम ओ कूचे गली दिखे बंजर वीरान सहरा,
आंगन में गुलो गुलफ़ाम ना सही, दरीचे में गुलदस्ता रखना

यहाँ मुज़रिम हर शक़्स, मुंसिफ़ भी वही,
ना कर ज़ुर्म, ना जुर्म करने वाले से कोई वाबस्ता रखना

गो आते जाते है याँ कई काफ़िर ओ फ़कीर,
अपने संग ए दिल को मोम के मानिंद पिघलता रखना

आती जहाँ गद्दारी ओ लाचारी की बदबू,
सच्चाई, नेकी ओ ईमान से फ़िजा को महकता रखना

मस्ज़िद नमाजियों के लिये, कलिसों में पंडित,
ख़ुदा को तू बस अपने घर का पता तो बता रखना

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
२८/१२/१७

सफ़र…Safar…

“हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले”

सफ़र…

उम्र का सफर रेल गाड़ीयों की तरह,
ख़्वाब सूने खड़े रहते वाँ उन पेड़ों की तरह

कभी ये उमंगे होती चंचल ग़जालों सी ,
भागती क्यूँ दूर हमसे इन ख़यालों की तरह

दिलो दिमाग़ की कश्मकश चले पैहम,
जैसे ख्वाहिशें मंडराती उन तूफ़ानों की तरह

कश्तीयाँ चले उम्मीदों के बादबानों से,
साहील से मिलने बेताब उन लहरों की तरह

देते हो नसीहत तुम आयात के मानींद,
फिर भी हो पुर-असरार किताबों की तरह

बा हजारां इश्तियाक़ न होती मुक़म्मल,
नज़र आती दश्त में उन सराबों की तरह

ये मख़्फी तव्वकों यादों के कफ़न में,
वाँ भी उठ रहा धुआँ बुझती चिताओं की तरह

ये किस बदनसीब की गोर या ख़ुदा ?
दिखे बंज़र ओ वीरान बे मुक़म्मल मुरादों की तरह

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
११/०४/१७