आख़िरी पैगाम…ख़ुदा हाफिज़…A Point Of No Return…

आख़िरी पैग़ाम…A point of no return…

जब किसी से मिलों गलियों में, हिज़ाब रखना,
झाँक कर ना देखे कोई, आरिज़ ओ लबों पे नक़ाब रखना

तुम बस मेरी थी, और मेरी ही बनकर रहना,
ये ख़यालात हमेशा याद, तुम मेरे ज़नाब रखना

दुश्मनों की नही है कोई कमी इस दुनिया में,
कौन रक़ीब और कौन हबीब इसका हिसाब रखना

इस अफ़साने में अब ना होंगी मुख़्तसर मुलाकातें,
यादों के सफ़हे मोड़ने, लिखकर इक किताब रखना

शब ए वस्ल अब ना होंगी पैकर हकीकतों में,
दिनो को शादाब-नुमा बनाने का हसीन ख़्वाब रखना

जमाना पूछेगा मेरे बारे में कई सवालात तुमसे,
जरा सोच लेना, तैयार जरूर कोई जवाब रखना

न हुई अब जो पैकर, अगले जनम मेरे जनाब,
ये हसरतें, ख़्वाबिदा ख़यालातें, ये ख्वाइशें बेहिसाब रखना

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरू
१७/०५/१७

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आईना ए रूखसार… Aaiena E Rukh saar…

आईना ए रूखसार…

ऐ जिंदगी, तुझको मैंने बहुत करीब से जाना है,
लेकिन तू मुझे जान ना पायी ये तूने भी माना है

चेहरे पर अब झुर्रियों की मासूम आती शिकन,
कहकहे लगा छुपा लूँ तो दुनिया कहती दीवाना है

शब ए रोज़ देखती हो मुझे बेख़ुदी के मंज़र में,
दो घूंट पी लूँ फिर खुशियों का ना कोई पैमाना है

पलकों की कतारों में असीर है ये बेबस आँसू,
आस्तीन से पोछ लेता हूँ, रूह में झाँकने का आईना है

इन कपकपाते लबों पर जो लगायी है तूने मोहर,
आईना ए रुख़सार करें बयान इन में छुपा अफसाना है

नसीम ए सुबह में लहराते सफ़ेद दाढ़ी ओ ज़ुल्फ़,
क्यूँ लगे दुनिया को इस दिल में उठा कोई तराना है

तू लाख करे कोशिश मेरे रूह को जानने की,
हर सिम्त से गूंजती मेरी खामोशी तुझे समझाना है

ऐ जिंदगी, तूने मुझे ना जाना, ना ही पहचाना है,
उठायेगी कफ़न तब होगा एहसास ये शक़्स कितना अंजाना है

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
१५/०५/१७

कोई गिला नही…Koi Gila Nahi…

कोई गिला नही…

तू ख़ार ख़ार है, हम ज़ख्म ज़ख्म हुए, कोई गिला नही,
ज़ख्म ए निहाँ पर मरहम गर न लगाये, कोई गिला नही

दिल को दिये चाक दर चाक, जुलाहा था तू जिगर,
बिखरे काँटे समेट कर खामोश लब सिलाये, कोई गिला नही

गुनाह ए मुहब्बत की, ता उम्र बन बैठे गुनहगार हम,
अब तू या गैर भी हमें फाँसी चढ़ाये, कोई गिला नही

तेरे हम-बज़्म ने बेसबब क़सूरवार साबित किया हमें,
खड़े है कटघरे में कोई भी सज़ा सुनाये,कोई गिला नही

साथ तेरे, इस शहर का हर शक़्स बन बैठा है मुंसिफ़,
मुद्दई किस अदालत के दर खटखटाये, कोई गिला नही

गो तुझे माफ कर दिया है हमने, ज़हर पी पी कर,
आब ए मुकद्दस भी बहुत है पिये, कोई गिला नही

निकल पड़े थे रहगुजर, सू ए दर ए यार की ज़ुस्तजू में,
सामने गर दिखे सर ए दार, मौत के साये, कोई गिला नही

उठा अब ईमान का ये नक़ाब तेरे रुख़सार से ऐ जालीम,
यहाँ भी अगर हम काफ़िर सनम पाये, कोई गिला नही

मुख़्तसर पलों में मिले कई लम्हे यादगार अक्सर,
ऐ जिंदगी तुझको बहुत है जिये, कोई गिला नही

आ बैठे है तेरे दर पर ऐ खुदा, बड़ी ‘हया’ से हम,
अब कब्र से गर तू कफ़न भी उठाये, कोई गिला नही

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरू
१०/०४/१८

मिरे ख़्वाबों में…Mire Khwabon Main…

मिरे ख़्वाबों में…

आप आते क्यूँ हो ज़नाब मिरे ख़्वाबों में ?
करते हो सादगी से आदाब मिरे ख़्वाबों में

देखकर तेरा हुस्न ओ शबाब, जल गया माहताब,
वो जलकर बन गया आफ़ताब, मिरे ख़्वाबों में

ना पहना किजिये नक़ाब, ना कोई हिज़ाब,
क्यों ना देखे हम तुम्हे बेहिसाब, मिरे ख़्वाबों में

पीनेवाले है, पीते है दिलकश सी ये शराब,
ना है कोई पैमाना, ना कोई हिसाब, मिरे ख़्वाबों में

ना करो आप इतने सवाल, ए मिरे हमनवाज़,
आज मिरे पास ना है कोई जवाब, मिरे ख़्वाबों में

आओ बैठो पास, ना दिखाओ सराबों सी आस,
देखने दो बस मुख़्तसर ख़्वाब, मिरे ख़्वाबों में

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
०९/०५/१७

इक तरफ…Ik Taraf…

इक तरफ़…

इक तरफ़ मयकदा इक तरफ़ दैर ओ हरम,
कर ना सकें फैसला जायें कहाँ किधर हम

निकले थे घर से सोचकर जायें ख़ुदा के आलम,
रिंदे हमें बहकाके ले गए मैख़ाने क्या करेंगे हम ?

साक़ी तेरी ज़ुल्फ़ों का महकता शबनमी आलम,
फिज़ाओं में खोये क्यूँ खींचती तेरी यादें ओ सनम

तुम मिलो तो करें परस्तिश, आपकी कसम,
ख़ुदा भी हो बदगुमां जब देखे, है तेरे कदमों पर हम

खानाबदोश फ़ितरत, ना खुशी, ना कोई ग़म,
जिस सिम्त ले चले कारवाँ वहाँ चलते हमारे कदम

करें ना गिले शिक़वे, गो लाख हुए है सितम,
बे फ़िकरे हम, करते चले यूँ “हया” से करम

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरू
७/५/१७

इन्तेज़ार… Intezar…

इन्तज़ार…

तुमको देखे दिन, माह,साल हो गये है गुजर,
आँखे मुन्तज़िर खोजती खाली कूचे, गली, रहगुज़र

इन्तजार एहसास का, जो महसूस हुआ था कभी,
लर्ज़िश ए ख़यालों से कांपता ये बदन आये नज़र

बंद दरवाज़ों पर दस्तक देता है जब कोई,
लगे शब ए वस्ल ए यार आयी है मुझसे बेख़बर

लोग मिलते है बदलती फिज़ाओं के मानिंद,
मुझे मिलने ले आना पहली मुलाक़ात की ख़ुशबू की ख़बर

इस दिल में शमा ए उम्मीद जिंदा है ऐ ज़िगर,
आना इन चिरागों को महफूज़ रखने ओ सितमगर

पलकों में असीर है कई तमन्नायें बरसों से,
अश्क़ों से शानों को भिगोने आना तुम रहमगर

कितने हो बेबस ये हमें न बताना फिर कभी,
कश्ती की साहिल से बेबसी न जाने ये समंदर

रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया निभाने मत आना अब तुम,
आना तो बस मुझसे तुम्हें है अदना सा इश्क़ अगर

कहते हो मुझे अना-परस्त,ना समझे मेरी जुबान,
गर बैठो ‘हया’ के साथ, मत गिनना ऐब, उसके सर ए क़बर

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
१८/०३/१८

मुन्तज़िर waiting
लरझिश ए ख़याल quivering of thoughts
महफूज़ safe
असीर prisoner
शाना shoulder
रस्म ओ रह ए दुनिया traditions and ways of the world
अदना small
अना परस्त self centered
ऐब shortcomings
सर ए क़बर headend of/near the grave

मेरी ग़ज़ल…Meri Gazal…

On world poetry day…

मेरी ग़ज़ल…

रूह की मुख़्तसर आवाज़, मेरी ग़ज़ल,
बन गयी तरन्नुम ओ साज, मेरी ग़ज़ल

पुकारती खुशियों को हर सिम्त तनहा,
मेरे वजूद की ये एहतियाज, मेरी ग़ज़ल

बनकर चारगर, दिया है दर्द हमें बेहिसाब,
मेरे मर्ज ए इश्क़ की इलाज़, मेरी ग़ज़ल

एक ईंट से तामीर हुआ था तसव्वुर में ताज,
आज इन अ’शआरों से बन गयी है नाज़ मेरी ग़ज़ल

परिंदों सी उड़े खुले आसमानों में सरहदों से परे,
छोड़कर लिबास ए मज़हब, बनी नग़्मा-परवाज़ मेरी ग़ज़ल

कहीं शिद्दत ए एहसास ए तन्हाई की पुकार,
कभी शिद्दत ए एहसास ए ग़म की आवाज़ मेरी ग़ज़ल

सहर होने को है, सुन लो मेरी भी इक अज़ान,
रुदन जो है ख़ार-ख़ार ए ख़ातिर ए आगाज़ मेरी ग़ज़ल

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरू
१२/०५/१७

एहतियाज= आवश्यकता
शिद्दत ए एहसास ए तन्हाई intensity of feelings of lonliness
ख़ार ख़ार ए ख़ातिर ए आगाज़ disquititude/anxiety of the heart in the begining

ये न थी हमारी किस्मत…Last Words…Ye Na Thi Hamari Kismat…

ये न थी हमारी किस्मत…Last words…

मेरी साँसों पर गर होता थोड़ा इख़्तियार मेरा,
करते ता उम्र इन्तेज़ार, रहता दिल बेक़रार मेरा

तूम होते गर चारागर, या ग़म गुसार मेरे,
करते इक़रार होकर तुझ पर दिल निसार मेरा

तलाश ए मुसलसल से हो गयी थी वाकफ़ियत,
गर देते साथ, तो होता ये सफ़र ख़ुशगवार मेरा

तूम मिल जाओ किसी मकाम पर है इल्तिज़ा मेरी,
तस्सवुर में ही सही, होता विसाल ए यार मेरा

मेरे जहन में तुम्हें छुपाऊँ, यही तमन्ना रखूँ अभी,
मिलेगा राहत ओ सुकून, होगा दिल ए करार मेरा

नाम तुम्हारा लिए लबों पर ये सफ़र हो आगाज़,
रूह कफ़स से कब होगी आज़ाद, न मुझ पे ऐतबार मेरा

सांसों का कफ़न ओढ़े,”हया”से तेरे आग़ोश में,
ये मिरी ख्वाईश ही सही, दर ए यार पर हो मज़ार मेरा

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरू
२८/०४/१७

तू और मैं…Tu Aur Mai…

The picture is depicted solely for purpose of understanding the poetry…No intention of copyright violation

तू और मैं…who created whom…???

तू रोशनी का उजाला, मैं सियाह घटा का घोर अंधेरा,
मैं ढलता हुआ शब, तू मिरी आगाज़ ए सफ़र का सवेरा

तेरा हसीन चेहरा,मिरे रुख़सार पर गर्दिशों का डेरा,
मैं लहरों की जुम्बिश, तू मिरा मुस्तक़ीम किनारा

तू बारिश की सोंधी मिट्टी,मैं मुश्त ए ख़ाक ए सहरा,
मैं हूँ तिश्नगी, तू पानी की बरक़त का नायाब नज़ारा

कहीं खिलता खिजां में फूल, कहीं जश्न ए बहारा,
शब ओ सहर ढूँढता हूँ,पाने दरख़्तों से इक आसरा

मुसाफ़िर हूँ चलता दर ब दर कहीं भी ना मिरा बसेरा,
ढूँढता याँ मुक्कमल जहां, लेकर कारवाँ ये मेरा

थक गया अकेला रहगुजर पर, जो चलकर है गुजारा,
ओढ़ कर कफ़न से, दे मुझे तेरी आग़ोश में सहारा

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
७/५/१७

सियाह black
आगाज़ begining
जुम्बिश movement
मुस्तकीम steadfast
मुश्त ए ख़ाक ए सहरा handful of dust of desert
दरख्त trees
तिश्नगी thirst
बरक़त excess
आग़ोश embrace

पच्चासी- young at heart💋❤️💃

पच्चासी- young at heart💋❤️💃

गुजर रहे उम्र के दिन, महीने और साल,😔
मेहँदी लगाकर ढक रही हूँ ये सुनहरे बाल👵

कोई कहे काकी, मौसी,नानी या दादी,😲
सुनकर ये बड़े ख़िताब होता है जी बेहाल😒

क्यों नही दिखता ये दिल अभी भी है जवान,😍
बचपन में मारते थे ताने”अरे जा रही देखो माल”💃

मयकशी चढ़ती, शराब जितनी हो पुरानी,🍷
वाइजों को है तजूर्बा, फिर पूछते क्यों सवाल ?🤔

हाय !!!अंगूर थी, कमसिन कली नादान,🤗
बनी किशमिश मीठी, कह दूँ दिल का हाल😋

निकल पड़ी जब घर से सज धज करे होंठ लाल,👸
पड़ोसी सोचे शायद काली है इसकी दाल!!!🤷

जाऊँ गर कभी खेलने, भागने, दौड़ने,💃
कहते लोग इस बूढ़ीया की क्या है मजाल ?😠

उम्र के इस दौर में किये बदलाव दो चार,🤷
चलती हूँ अब थोड़ी धीरे, बदल गयी है चाल🤰

बदलती इस दुनिया के देखे है रंग हज़ार,😦
हो गयी हूँ अब सयानी, अब न फसूँ किसी के जाल😤

संभल कर रहना भाइयों अब इस नारी से,😎
किसी ने की छेड़खानी तो मच जायेगा भूचाल😠

कोई कुछ भी कहे, अब जी रही हूँ खुद के लिए,
चाहे बूढ़ी कहो या जवान, है तो हम बेमिसाल👼

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
८/३/१८