ये धुआँ उठता चला…Ye Dhuan Uthata Chala…

ये धुआँ उठता चला…

हर दाम पर यहाँ, ये धुआँ उठता चला,

रेत में नक्शे पा जहाँ, ये धुआँ उठता चला

वक़्त चला पैहम, जिंदगी गुजरे तनहा,

मुश्त ए ख़ाक से यहाँ, ये धुआँ उठता चला

जज़्बा ए दरिये से ना बुझे सोज़ ए दिल,

ये जलते एहसास वहाँ, ये धुआँ उठता चला

उजड़े विरान ओ बंज़र पुराने मकान,

ढूँढे वस्ल ए मकाम कहाँ, ये धुआँ उठता चला

शहर की गली गली में देखता हूँ अब,

गो आवाज़ गूँजती निहां, ये धुआँ उठता चला

क़ज़ा गर देख रही अपनी ही मौत को,

जलती चीता से बेइन्तहां, ये धुआँ उठता चला

मिरी मज़ार पर यारों यूँ ग़म ना करो,

ख़्वाबों का कफ़न जले यहाँ, ये धुआँ उठता चला

कभी मगरूरी में, ना कभी “हया” से,

चिराग़ बुझे, ख़ाक जहाँ, ये धुआँ उठता चला

डॉ नम्रता कुलकर्णी

बेंगलुरु , ३०/०४/१७

ऐ नादान…Aye Nadaan…

ऐ नादान…

क़िताबें पढ़कर ना बन पाये शेख़, ऐ नादान,    
पहले अपने दिल को पढ़कर देख, ऐ नादान

जाता है दैरो हरम में, बेजुबान बूतखानो में,
खुद के जहन में झाँक कर तो देख, ऐ नादान

ज़माने के मलालों से तू लड़ने जाता है क्यों,
अंदर के शैतान को राख़ कर देख, ऐ नादान

दुनिया इक फ़रेब है, ना जता मोहब्बत यहाँ,
दीवारों भीतर इख़लाक़ रख कर देख, ऐ नादान

“हया” से बढ़कर ना है कोई सीख, ऐ नादान
ख़ुद को तो बदल कर तू ज़रा देख, ऐ नादान

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु

३१/०५/१७