चेहरे अन मुखवटे…

चेहरे अन मुखवटे…

कधी चेहऱ्यावर घातले हे मुखवटे,
कधी मुखवट्यावर बसलेले चेहरे,
अजब दुनियेचे सगळे गजब मोहरे।

बुरख्याच्या मुखवट्यात माझिया सखे,
भावनांच्या छटांचे रंगच निराळे,
कोणाच्या नजरेस ना पडे काय खोटे न खरे।

एक अश्रू नयनात हळूच येऊन तरळे,
म्हणे, खोटेच हसू गालावरी उमलले बरे,
क्षणात मग कसे ग ते विरले ???

रोज नवीन चेहरे, अन मुखवटे,
कोणाचा कोण, कोणालाच न कळे,
चक्रव्यूहात फसले अन अडकलेले पिंजऱ्यात सारे।

रोज बदलतात हे मुखवटे कसे,
आरसा देखील बघून विचारात पडे,
समोर एक चेहरा, प्रतिबिंबात वेगळा दिसे !

वाटतं, कधी कधी दूर सारून हे पडदे,
पहावा स्वतःचा चेहरा एकदा खरे,
आहे खरी कशी मी, माझे मलाच न कळे !!!

NK
०२/०८/१७

Advertisements

एकदंत…Ekadant…

एकदंत…

निश्चिन्त, निवांत, निश्चल, शांत,
थकलेल्या जीवाला क्षणाचीच उसंत।

कुठे शोधिसी आरंभ, कुठेसी अंत,
एकचं ध्यास अंता अंती दे सुखांत।

कुणास म्हणे संत, कुणासी महंत,
आम्हासी ना पदवी, नाही ती खंत।

दूर दृष्टी पथावर मिळेना मनी विश्रांत,
पथिक जगाचा मिळाली फक्त श्रांत।

ठेव तुझ्या चरणी होऊ दे निवांत,
निश्चिन्त होतीसी संगती तुझ्याच एकदंत।

NK
३१/०७/१७

मैं स्त्री हूँ…I am a woman…

मैं स्त्री हूँ…

ऐ स्त्री, तुम कभी पुरुष न बन पाओगी,
मगर मैं स्त्री हूँ, मैं क्यूँ पुरुष बनना चाहूँगी ?
मैं स्वतंत्र स्त्री हूँ, परतंत्र से क्यूँ जीना चाहूँगी,
आज़ाद हूँ, आज़ादी से ही जीवन बिताऊँगी।

ज्ञान की तलाश में जो मुझे छोड़ गया,
मैं तो उसे छोड़ने में कभी न कतारूँगी,
यशोधरा भी न बनना चाहूँगी
स्वावलंबी हूँ वैसे ही रहना चाहूँगी।

जब न थी कोई गलती मेरी शाप से शिला बन बैठी,
मुक्ती देने लगी जरूरत फिर किसी अजनबी पुरुष की,
मैं वो अबला अहिल्या न बनना चाहूँगी,
स्वाधीन न करूँ किसीको खुद स्त्री रहना चाहूँगी।

जिसने उठाये सवाल मेरे चरित्र पर,
उसको भी अग्नी परीक्षा मैं दिलवाऊंगी,
मैं सीता भी न बनना चाहूँगी,
अनाधीन स्त्री हूँ, वैसे ही रहना चाहूँगी।

जो गाती रही गुणगान उसके लेकर इकतारा,
जो बन न पाया उसका सहारा,
न मैं वो मीरा, न मैं वो राधा बनना चाहूँगी,
स्वछंदी स्त्री हूँ, वैसे ही जीना चाहूँगी।

थे वो पाँच बड़े धनुर्धारी बलवान,
न बचा पाये लाज लज्जा जिसकी,
मैं तो वो द्रौपदी भी न बनना चाहूँगी,
खुद की इज्जत खुद बचाने आत्मनिर्भर बनना चाहूँगी।

बांधी जिसने आंखों पर पट्टी,
जिसके लिये बना ली अपनी दुनिया अंधेरी,
मैं तो वो गांधारी भी न बनना चाहूँगी,
दी है जो दृष्टि मुझे, अपने पथ पर ही चलना चाहूँगी।

हाँ मैं नाजुक हूँ, पर कमजोर नही,
हाँ मैं सरल हूँ, पर नासमझ नही,
हाँ मैं सहज हूँ, पर रुक्ष नही,
हाँ मैं निश्चल हूँ, पर बलहीन नही,
हाँ मैं निर्मल हूँ, पर अपूर्ण नही,
हाँ मैं कोमल हूँ, पर दुर्बल नही,
हाँ मैं जीवन हूँ, पर असहाय नही,
मैं प्रेम हूँ, मैं सिर्फ प्रेम हूँ,
हाँ, इसलिए तो मैं एक स्त्री हूँ, मैं एक स्त्री ही रहना चाहूँगी,
मैं कभी भी पुरुष न बनना चाहूँगी,
मैं कभी भी पुरुष न बनना चाहूँगी।

NK
०४/१२/१८

जरा रुक जाओ…Jara Ruk Jao…

जरा रुक जाओ…

आरिज ओ लबों से उठाओ नक़ाब, ज़रा रुक जाओ,
पूर नूर करो फ़िजायें ज़नाब, जरा रुक जाओ

उठ गया जो ये नक़ाब, फिर छेड़ा हमें क्यूँ जनाब,
रुखसार से जुल्फों को कर बेनक़ाब, जरा रुक जाओ

पाज़ेब ए शब की छम सुन, आयी नसीम ए सहर,
फ़िर नयी शमा जलाओ आफ़ताब, जरा रुक जाओ

तक़दीर में लिखी मौजों की रवानी नायाब,
ये कश्ती ना डुबाओ, ओ सैलाब, जरा रुक जाओ,

ऐ रात के मुसाफ़िर, चाँदनी को तुम ना मुरझाओ,
नीम शब होने को है, ओ माहताब जरा रुक जाओ

किताब ए जिंदगी के मुड़े सफ़हे को ना सुलझाओ,
भरूँ रंग नये पन्नों में बेहिसाब, जरा रुक जाओ

अफ़सानों को अल्फ़ाज़ों के ग़ज़ल में पिरोकर,
लिखनी है मुझे एक नयी क़िताब, जरा रुक जाओ

चलते चलते रहगुज़र थक गये मेरे खयाल ओ ख़्वाब,
चंद लम्हें सुकून से गुजारूँ, पहन कफ़न ए हिज़ाब, जरा रुक जाओ

ऐ क़ज़ा, आ कर तुम मेरे पास ना ऐसे मंडराओ,
जिंदगी के बाकी है और कई हिसाब, जरा रुक जाओ

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
३१/०७/१७

जुगनू…Juganu…

आसमां में चले सितारों के कारवां,
अंधेरी रातों में रोशनी लिए,
ऐ चाँद तू कही रास्ता न भूल जाये,
आये है हम देने साथ इक जुगनू की तरह…

NK

जुर्म खुद मैंने ही किया है…Jurm Khud Maine Hi Kiya Hai…

जुर्म खुद मैंने ही किया है…

जुर्म ख़ुद मैंने ही किया है, तो ख़ता क्या है,
तुम्हारा मुज़रिम हूँ, सुनाओ सज़ा क्या है

आरिज़ ए लबों से नक़ाब उठा तो समझे,
रातभर शमा से परवाना जलता क्या है

ऐ हक़ीम, नब्ज़ देखकर क्या हो इलाज़,
इस मर्ज़ ए इश्क़ बीमार की दवा क्या है

बेवफ़ाई करो तो जानो वफ़ा क्या है,
फ़ासले बढ़ चुके, सुनाओ फैसला क्या है

ये आसमान, ये सीतारे, ये रास्ते, ये जहां,
है सब तो उसी का, फिर आपका क्या है

शिवाले, कलिसे, मस्जिदों के राहगीरों,
इख़लास से करो इबादत,जानो दुआ क्या है

जिंदगी की रहगुज़र चलता अकेला चल,
आगे मंज़िलें ना दिखे, आगे रास्ता क्या है

देख तेरी जहां में हश्र का मंज़र आ गया,
बुतखाने से बाहर निकल तू यूँ छुपा क्या है

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
१७/०७/१७

जुर्म खुद मैंने ही किया है…Jurm Khud Maine Hi Kiya Hai…

जुर्म खुद मैंने ही किया है…

जुर्म ख़ुद मैंने ही किया है, तो ख़ता क्या है,
तुम्हारा मुज़रिम हूँ, सुनाओ सज़ा क्या है

आरिज़ ए लबों से नक़ाब उठा तो समझे,
रातभर शमा से परवाना जलता क्या है

ऐ हक़ीम, नब्ज़ देखकर क्या हो इलाज़,
इस मर्ज़ ए इश्क़ बीमार की दवा क्या है

बेवफ़ाई करो तो जानो वफ़ा क्या है,
फ़ासले बढ़ चुके, सुनाओ फैसला क्या है

ये आसमान, ये सीतारे, ये रास्ते, ये जहां,
है सब तो उसी का, फिर आपका क्या है

शिवाले, कलिसे, मस्जिदों के राहगीरों,
इख़लास से करो इबादत,जानो दुआ क्या है

जिंदगी की रहगुज़र चलता अकेला चल,
आगे मंज़िलें ना दिखे, आगे रास्ता क्या है

देख तेरी जहां में हश्र का मंज़र आ गया,
बुतखाने से बाहर निकल तू यूँ छुपा क्या है

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
१७/०७/१७

लेकिन…Lekin…

लेकिन…

माना तेरा अंदाज़, इक तर्ज़ ए तग़ाफ़ुल हो लेकिन,
मिरी हसरतें भी, कभी तो कुबूल हो लेकिन

चाहतें तो है, गो सोहबतें भी हो लेकिन,
अपने आप में तुम कितने मशगूल हो लेकिन

ता हद्द ए नज़र दिखते है गुलज़ार ए आलम,
दिल ए गुलफ़ाम का आप महकता फूल हो लेकिन

दरख्तों को परिंदों की जरूरत तो नही होती,
मिरी शाखों के आप गुल ओ बुलबुल हो लेकिन

या ख़ुदा, तग़ाफ़ुल कर या तजाहुल कर लेकिन,
तू अपने आप में ना ग़ाफिल हो लेकिन

ओ रे माज़ी, दरिया ए इश्क़ में ग़र्क़ हो न हो मगर,
कर यूँ इख्तियार अब न कोई भूल हो लेकिन

हश्र की तन्हाईयों ज़रा सब्र तो करो,
करते कई दुआ, बस मक़बूल हो लेकिन

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
१५/०७/१७

दे दे…De De…

दे दे…

मुझे मेरे बचपन की बेफ़िक्र नादानी दे दे,
किसी दिलजले को इक मीरा दीवानी दे दे

घिरा जो समन्दर से, सुन जज़ीरे की पुकार,
हर दश्त ओ कोह ओ सहरे को पानी दे दे

आंधियों में परवाने को शमा की है रविश,
अंधेरी राह चलते हर राही को रवानी दे दे

इन्सान को नफ़रत जहाँ है इन्सानो से,
रहम कर इस बंदे को नियत इन्सानी दे दे

उठ रही है तलवारें, खंज़र ओ छुरियां याँ,
ईमान से चमकाने ज़मीर, थोड़ी ताबानी दे दे

किसी औऱ गोर पर बैठ कर रो लेना ग़ालिब,
मिरी मज़ार पे बहार ए गुलशन ए जावेदानी दे दे

गो बहुत जी चुके हम तेरी बेरहम दुनिया में,
‘हया’ की आख़िरी ख्वाईश, ये मौत आसानी दे दे

डॉ नम्रता ‘हया’ कुलकर्णी
बेंगलुरु
१५/०७/१७

एक सटिक विश्लेषण…

🙏🏻🌻🙏🏻🌻🙏🏻🌻🙏🏻🌻

ये दुनिया सकारात्मक और नकारात्मक इन दोनों तत्वो के विरोधाभास से बनी है।
(World of duality).
भौतिक वस्तुओं से लेकर इंसानी जस्बे तक, सभी मे तत्वो का विरोधाभास हैं।
एक तरफ सुकून का अहेसास तो दूसरी तरफ दर्द का अहेसास।
सकारात्मक की कीमत बढ़ाने के लिये नकारात्मक की व्यवस्था शायद मानो जानबूझ कर की हो।
इन विरोधाभास में एक जिंदगी का हिस्सा जी कर,सुकून का लुफ्त उठाकर और दर्द को सह कर,इंसान इस निर्णय पर पहुचता की बस अब बहोत जी लिया।
अपने लिये एक आसान मौत की दुआ करता हैं इंसान,
पर एक ख्वाइश भी रखता है मरते वक्त भी,की उसकि मजार पर फूलों चादर,गुलो की सुगंध और मालिक के नूर की सनातन खुशबू छायी रहे।

ये आखरी मिसरा अपने आप मे बहोत गहराई रखता है,
ये एक संदेश देता है की इस विरोधाभास से भरी दुनिया मे कुछ ऐसे सलीके से जिओ ताकि आपकी आसान मौत की दुआ कुबूल हो जाये और उससे भी बढ़कर आपकी की मौत की बाद आपकी यादे कुछ इस तरह हो कि लोग मजबूर हो जाये आपकी मजार को फूलों से ढकने।
एक दिन धर्म के नियमों से जी हुई जिंदगी,इंसानियत हो हर समय मध्य नजर में रखी हुई जिंदगी,ईमानदारी से भरी जिंदगी,खुदा की इबादत और बंदगी से भरी जिंदगी,आपको सुकून भारी मौत का अधिकारी बनाती है।
आप को याद किया जायेगा उन सभी की तरह जिन्हें मालिक का पैगाम लाने वाले पैगम्बर(messenger) कहा जाता है।
अच्छी और सच्चा संदेश देने वाली रचना के लिये शुक्रिया।

🙏🏻🌻🙏🏻🌻🙏🏻🌻🙏🏻🌻

पुन्हा एकदा… Punha Ekda…

पुन्हा एकदा…

पुन्हा एकदा भरकटलय हे उनाड मन,
संवाद करतय निशब्द संयमी अंतरमन।

उठलंय विचारांचे वादळी तुफान,
वादळात नौका झालीये दोलायमान।

आठवणींचा दुःख सुखांचा वर्षाव,
विजे सारखी क्षणिक त्यांची आव जाव।

जाणीव मन-शिंपल्यातल्या मोतीया क्षणांची,
सैरभैर लाटां सम उसळणाऱ्या चंचल आठवणींची।

आठवणीत राहिलेत दुःखाचे बोचरे वाळूचे कण,
जखडून त्या सुखसागराला घालून वेसण।

ए ‘हया’ ! ऐक न जरा, घे मनावर,
कुठूनसा आवाज आला खरा कानावर !

आर्त हाक मारतय ते अंतर्मन,
जनाच नाही, त्याचं ऐक न, एकच क्षण।

पुन्हा एकदा भानावर आलय हे विचलित मन,
नको करुस विचार ग, जग तू आता… क्षणोंक्षण।

डॉ नम्रता ‘हया’ कुलकर्णी
बेंगलुरु
१३/०७/१७