दृश्य-अदृश्य…Drushya-Adrushya…

Who created whom…???

अदृश्यातूनी दृश्य घडले,
(Big bang theory)
की दृश्यातूनी अदृश्य ?
तू मला की मी तुला घडविले मनुजा,
कोण करेल ह्यावर भाष्य ?

NK

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दृश्य-अदृश्य…Drushya-Adrushya…

दृश्य स्वरूपात दिसे सामोरी,
न बोले चांगले शब्द तयासाठी,
अदृश्य स्वरूपात न दिसे मजसी,
गुणगान त्याचे कुणासाठी ?

NK

अदृश्य बंधन…Adrushya Bandhan…

तुझ्या माझ्या मधे कसलं हे अदृश्य बंधन,
तू नाही तर कुणाची मी काढू आठवण ?मी नाही तर तुझे अस्तित्व मात्र मातीमोल, म्हणूनच राहू दे ह्या नात्यात असाच मेलजोल।

NK

इन्तेज़ार… Intezar…

इन्तज़ार…

तुमको देखे दिन, माह,साल हो गये है गुजर,
आँखे मुन्तज़िर खोजती खाली कूचे, गली, रहगुज़र

इन्तजार एहसास का, जो महसूस हुआ था कभी,
लर्ज़िश ए ख़यालों से कांपता ये बदन आये नज़र

बंद दरवाज़ों पर दस्तक देता है जब कोई,
लगे शब ए वस्ल ए यार आयी है मुझसे बेख़बर

लोग मिलते है बदलती फिज़ाओं के मानिंद,
मुझे मिलने ले आना पहली मुलाक़ात की ख़ुशबू की ख़बर

इस दिल में शमा ए उम्मीद जिंदा है ऐ ज़िगर,
आना इन चिरागों को महफूज़ रखने ओ सितमगर

पलकों में असीर है कई तमन्नायें बरसों से,
अश्क़ों से शानों को भिगोने आना तुम रहमगर

कितने हो बेबस ये हमें न बताना फिर कभी,
कश्ती की साहिल से बेबसी न जाने ये समंदर

रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया निभाने मत आना अब तुम,
आना तो बस मुझसे तुम्हें है अदना सा इश्क़ अगर

कहते हो मुझे अना-परस्त,ना समझे मेरी जुबान,
गर बैठो ‘हया’ के साथ, मत गिनना ऐब, उसके सर ए क़बर

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
१८/०३/१८

मुन्तज़िर waiting
लरझिश ए ख़याल quivering of thoughts
महफूज़ safe
असीर prisoner
शाना shoulder
रस्म ओ रह ए दुनिया traditions and ways of the world
अदना small
अना परस्त self centered
ऐब shortcomings
सर ए क़बर headend of/near the grave

मेरी ग़ज़ल…Meri Gazal…

On world poetry day…

मेरी ग़ज़ल…

रूह की मुख़्तसर आवाज़, मेरी ग़ज़ल,
बन गयी तरन्नुम ओ साज, मेरी ग़ज़ल

पुकारती खुशियों को हर सिम्त तनहा,
मेरे वजूद की ये एहतियाज, मेरी ग़ज़ल

बनकर चारगर, दिया है दर्द हमें बेहिसाब,
मेरे मर्ज ए इश्क़ की इलाज़, मेरी ग़ज़ल

एक ईंट से तामीर हुआ था तसव्वुर में ताज,
आज इन अ’शआरों से बन गयी है नाज़ मेरी ग़ज़ल

परिंदों सी उड़े खुले आसमानों में सरहदों से परे,
छोड़कर लिबास ए मज़हब, बनी नग़्मा-परवाज़ मेरी ग़ज़ल

कहीं शिद्दत ए एहसास ए तन्हाई की पुकार,
कभी शिद्दत ए एहसास ए ग़म की आवाज़ मेरी ग़ज़ल

सहर होने को है, सुन लो मेरी भी इक अज़ान,
रुदन जो है ख़ार-ख़ार ए ख़ातिर ए आगाज़ मेरी ग़ज़ल

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरू
१२/०५/१७

एहतियाज= आवश्यकता
शिद्दत ए एहसास ए तन्हाई intensity of feelings of lonliness
ख़ार ख़ार ए ख़ातिर ए आगाज़ disquititude/anxiety of the heart in the begining

गुढी पाडव्याच्या शुभेच्छा🙏🙏🙏 … Happy Gudhi Padwa…

चैत्र सुरू झाला, करू साजरा गुढी पाडवा,
नवीन वर्ष साजरे करून, आनंद द्विगुणीतवाढवा।
घराच्या अन मनाच्या ही सफाईचा केर काढावा,
जुन्या नवीन सर्व नात्यांचा स्नेह संबंध जोडावा।
जुने वर्ष सरले, तसे लोभ मत्सर बाजूला सारावे,
नवीन वर्षात तुम्हास प्रेम, करूणा नी वात्सल्य लाभावे।
नव वर्षाच्या शुभेच्छा 🙏🌾🌿🍃🌹🌷
NK

नशिबी जे नव्हतंच…शेवटचे शब्द…Not Destined To Be…Last Words…

नशिबी जे नव्हतंच…शेवटचे शब्द…

माझ्या श्वासांवर जर असते रे नियंत्रण माझे,
बघितली असती वाट होऊनि हृदय बेचैन माझे

तू लावले असतेस जर जखमांवर मलम कधी रे,
ठेवला असता विश्वास तुज हृदय देऊन माझे

सतत शोधणार्या नजरेला झाली होती प्रचिती,
साथ लाभता तुझी झाले असते प्रफुल्लित जीवन माझे

तू भेटशील अजूनही कुठल्या तरी क्षणी अशीच प्रार्थना,
स्वप्नात होऊ दे मिलन हे मनोरथ, हेच स्वप्न माझे

खोल हृदयी लपवून ठेवू तुला हीच आकांक्षा घेऊनी,
लाभेल हृदयी शांतता अन होईल शांत हे मन माझे

नाव तुझे ओठावर घेऊन निघाले शेवटच्या यात्रेस,
माझिया न ताब्यात कधी उडेल मन पाखरू पिंजऱ्यातून माझे

श्वासांचा पदर ओढूनी आले नम्रतेने तुझ्या कुशीत,
तुझिया दारी घेईन श्वास अखेरचा हेच प्राक्तन माझे

डॉ नम्रता कुलकर्णी

बेंगलूरु, १४/०३/१८

ये न थी हमारी किस्मत…Last Words…Ye Na Thi Hamari Kismat…

ये न थी हमारी किस्मत…Last words…

मेरी साँसों पर गर होता थोड़ा इख़्तियार मेरा,
करते ता उम्र इन्तेज़ार, रहता दिल बेक़रार मेरा

तूम होते गर चारागर, या ग़म गुसार मेरे,
करते इक़रार होकर तुझ पर दिल निसार मेरा

तलाश ए मुसलसल से हो गयी थी वाकफ़ियत,
गर देते साथ, तो होता ये सफ़र ख़ुशगवार मेरा

तूम मिल जाओ किसी मकाम पर है इल्तिज़ा मेरी,
तस्सवुर में ही सही, होता विसाल ए यार मेरा

मेरे जहन में तुम्हें छुपाऊँ, यही तमन्ना रखूँ अभी,
मिलेगा राहत ओ सुकून, होगा दिल ए करार मेरा

नाम तुम्हारा लिए लबों पर ये सफ़र हो आगाज़,
रूह कफ़स से कब होगी आज़ाद, न मुझ पे ऐतबार मेरा

सांसों का कफ़न ओढ़े,”हया”से तेरे आग़ोश में,
ये मिरी ख्वाईश ही सही, दर ए यार पर हो मज़ार मेरा

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरू
२८/०४/१७

तू और मैं…Tu Aur Mai…

The picture is depicted solely for purpose of understanding the poetry…No intention of copyright violation

तू और मैं…who created whom…???

तू रोशनी का उजाला, मैं सियाह घटा का घोर अंधेरा,
मैं ढलता हुआ शब, तू मिरी आगाज़ ए सफ़र का सवेरा

तेरा हसीन चेहरा,मिरे रुख़सार पर गर्दिशों का डेरा,
मैं लहरों की जुम्बिश, तू मिरा मुस्तक़ीम किनारा

तू बारिश की सोंधी मिट्टी,मैं मुश्त ए ख़ाक ए सहरा,
मैं हूँ तिश्नगी, तू पानी की बरक़त का नायाब नज़ारा

कहीं खिलता खिजां में फूल, कहीं जश्न ए बहारा,
शब ओ सहर ढूँढता हूँ,पाने दरख़्तों से इक आसरा

मुसाफ़िर हूँ चलता दर ब दर कहीं भी ना मिरा बसेरा,
ढूँढता याँ मुक्कमल जहां, लेकर कारवाँ ये मेरा

थक गया अकेला रहगुजर पर, जो चलकर है गुजारा,
ओढ़ कर कफ़न से, दे मुझे तेरी आग़ोश में सहारा

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
७/५/१७

सियाह black
आगाज़ begining
जुम्बिश movement
मुस्तकीम steadfast
मुश्त ए ख़ाक ए सहरा handful of dust of desert
दरख्त trees
तिश्नगी thirst
बरक़त excess
आग़ोश embrace