बज़्म ए साक़ी…Bazm E Saaqi…

बज़्म ए साक़ी…

आये बज़्म में साकी, जलवा ए माशूक़ दिखा नहीं,
सुना था तेरे अंजुमन से, मायूस हो कोई लौटा नहीं

तमन्ना थी शब ए महफ़िल में मिलोगे तुम कहीं,
ज़ुस्तजू आब ए हयात कि, मिले किस महशीर पता नहीं,

ज़र ए नक़ाब देखा था हुस्न, बे नक़ाब दिखा नहीं,
हमारी दानिस्ता नज़र उठ गई थी, पर बे इरादा नहीं

महफ़िल ए ग़ैर में तेरे आगोश का ख़ुमार कहाँ,
ऐसा हुस्न परी चेहरा फिरदौस में भी देखा नहीं

इल्तिज़ा ए मुसाफ़िर थी, हम बज़्म मिलोगे तुम,
लौट आए मायूस हो कर जहाँ तेरा आशियाना नही

अदब आदाब भूल गए, बज़्म ए जाम में मयकशी नहीं,
किसी बज़्म ए गैर में तुझसा मुझे कोई मिला नहीं

मैख्वार सारे उदास, सुनी है महफ़िल साक़ी,
गो छलक रहा जाम ए शराब, तेरी मदहोशी का नशा नहीं

तू मिली नही तो अब कोई गिला शिकवा नही,
मयकदा साज़ हूँ, मयकदा बर दोश नहीं, कोई खता नहीं

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
०४/०५/१७

महशीर meeting
ज़र ए नक़ाब under the naqaab
आब ए हयात elixir of life
फ़िरदौस heaven
इल्तिज़ा ए मुसाफ़िर request of traveller
मैख्वार drinkers
मयकदा साज़ one who likes to drink
मयकदा बर दोश one who has addiction for drinking

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