तुम…Tum…

तुम…

देते हो नसीहत,आयात के मानिंद,
रूठते हो तुम हमसे किसी बात के मानिंद

हयात हो मेरी, कायनात भी तुम,
देते हो रुख़सत, तर्क ए मुलाकात के मानिंद

बने मेरे नग़मात, इक हसीन रात,
बख़्श दिये थे जज़्बात, उस बरसात के मानिंद

हुआ था तजदीद ए इल्तिफ़ात,
तूने दिया था तौफ़ा नायाब, सौग़ात के मानिंद

हमने चाँद से की रक़ाबत उस रात,
निकल पड़ी थी कायनात, इक बारात के मानिंद

आँखें पूछ रही तुमसे कई सवालात,
दे दो कुछ जवाबात, किसी वकालात के मानिंद

देख जज़्बा ए बे इख़्तियार ए शौक़,
‘हया’ से की मुहब्बत,मज़बूरी ए हालात के मानिंद

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
२७/०४/१७

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बज़्म ए साक़ी…Bazm E Saaqi…

बज़्म ए साक़ी…

आये बज़्म में साकी, जलवा ए माशूक़ दिखा नहीं,
सुना था तेरे अंजुमन से, मायूस हो कोई लौटा नहीं

तमन्ना थी शब ए महफ़िल में मिलोगे तुम कहीं,
ज़ुस्तजू आब ए हयात कि, मिले किस महशीर पता नहीं,

ज़र ए नक़ाब देखा था हुस्न, बे नक़ाब दिखा नहीं,
हमारी दानिस्ता नज़र उठ गई थी, पर बे इरादा नहीं

महफ़िल ए ग़ैर में तेरे आगोश का ख़ुमार कहाँ,
ऐसा हुस्न परी चेहरा फिरदौस में भी देखा नहीं

इल्तिज़ा ए मुसाफ़िर थी, हम बज़्म मिलोगे तुम,
लौट आए मायूस हो कर जहाँ तेरा आशियाना नही

अदब आदाब भूल गए, बज़्म ए जाम में मयकशी नहीं,
किसी बज़्म ए गैर में तुझसा मुझे कोई मिला नहीं

मैख्वार सारे उदास, सुनी है महफ़िल साक़ी,
गो छलक रहा जाम ए शराब, तेरी मदहोशी का नशा नहीं

तू मिली नही तो अब कोई गिला शिकवा नही,
मयकदा साज़ हूँ, मयकदा बर दोश नहीं, कोई खता नहीं

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
०४/०५/१७

महशीर meeting
ज़र ए नक़ाब under the naqaab
आब ए हयात elixir of life
फ़िरदौस heaven
इल्तिज़ा ए मुसाफ़िर request of traveller
मैख्वार drinkers
मयकदा साज़ one who likes to drink
मयकदा बर दोश one who has addiction for drinking

तेरे माथे पर बिंदिया का…Tere Mathe Par Bindiya Ka…

Have a romantic Valentine’s day💖💞💕❤…

तेरे माथे पर बिंदिया का ताब चमके,
जैसे रुख़सार ए आसमान पे आफ़ताब चमके

तेरा हुस्न ए नूर बहुत लाजवाब साकी,
आरिज़ ए गुल पे तिल, ज़र ए नक़ाब चमके

ज़ुल्फ़ ए सियाह का चिलमन जब उठे,
उन घने बादलों में चांदनी का माहताब चमके

सीपियों के पंखुड़ियों में निखरे गौहर,
शबनमी होठों पर आँसूओं का आब चमके

दरिया में डूब जाऊँ, या बचा ले मुझको,
ये गहरे समंदर निगाह ए शोख़ बेताब चमके

तुझे देख कर न रहे खुशियों का पैमाना,
चश्म ए नम से गिरते आँसू बेहिसाब चमके

तू दिखे रु ब रु, या बेख़ुदी के ख़यालों में,
तेरा अक्स जब छलके, जाम ए शराब चमके

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु

मौला के बंदे…Maula Ke Bande…

मौला के बंदे…

बेख़ुदी में पीते अक्सीर ए हयात की बूंदे,
मिले जब तेरे बज़्म ऐ साकी, कहलाते हम रिंदे

ना है धरम ओ ईमान, ना ही कोई मज़हब,
आज़ादी के नशे में सरहद से परे उड़ते हुए परिंदे

ज़ाहिद निकलता दर ए मस्ज़िद से नमाज़ी हो कर,
जब हम निकले ख़राबात से, लोग कहते दरिंदे

कभी इज्ज़त ना दी इस ज़ालिम ज़माने ने,
फ़िर भी करें एहतराम सबका, ना कहो हमें चरिंदे

रहते नज़्म ओ शायरी की दुनिया में मक़फूल,
कूचे गलीयों में, शहरो आलम के पोशीदा बाशिंदे

ना इरादें, ना उमंगे, ना है ख़फ़ीफ उम्मीदें,
तवक्कों से हुए बरबाद, कहो हमें मौला के बंदे

शर्म, ‘हया’, लिहाज़ रखो बतलाये वाईज़,
पीते ग़म भुलाने को, क्यूँ कहलाये शर्मिन्दे

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु, २६/०४/१७

Disclaimer:

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निकले थे घर से…Nikale The Ghar Se…

निकले थे घर से जाने कलिसे की ओर,
क़दम चल पड़े ना जानें क्यों, कहीं ओर

अजनबी मंजिलें ओ मुक़ाम दिखे रहगुज़र,
कश्मकश दिल में यहाँ जाऊँ, या कही ओर

कई हसरतें, कई उम्मीदें, ख़यालात मेरे,
ख्वाबों की सिंम्त मुख़्तलिफ़,मैं किसी ओर

बोझल ये ज़िगर, करूँ इसे हलका किधर,
रिन्दे बुलाये, हम चल पड़े, मैकदे की ओर

बेख़ुदी बसें जहाँ, ना है तफ़ावुत जिधर,
पहूँचे आख़िर मक़ाम पे, ए साकी, तेरी ओर

कहाँ से आगाज़, कहाँ मआल ए सफ़र,
निकले थे ‘हया’ से फैसला किये, कलिसे की ओर

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरू
२४/०४/१७

गो दुआ मेरी…Go Dua Meri…

Loved and lost …???💔

गो दुआ मेरी बे असर ना थी,
पर जिंदगी में यूँ सबर ना थी

काँटों की कभी चाह ना थी,
गुलों से सजी रहगुज़र ना थी,

मेरे चश्म जहाँ नम ना हुए,
मोहल्ले की कोई दर ना थी

तू याद ना आये इक लम्हा,
ऐसी ये दियार ए सहर ना थी

मेरे अश्क़ों में तू यूँ थम गयी,
तुझे कभी मेरी क़दर ना थी

निगाह ए चश्म ए दिल में थी,
गो तेरी नज़र को ख़बर ना थी

मेरे जिगर के यूँ टूकड़े करें,
तेज़ इतनी कोई खंज़र ना थी

दश्त दर दश्त मैं ढूंढता रहा,
कफ़न से ओढ़ी क़बर ना थी

लिहाज़ ए शरम, फ़िकर ना थी
“हया” मुझे भी अकसर ना थी

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
२२/०४/१७