बस इतना कर दो…Bas Itna Kar Do…

बस इतना कर दो…

मैं हूँ इक उलझा अदना सा लम्हा,
तुम मेरे रूठे हालात को सुलझा दो

कोरे सफ़हे पर खामोशीयाँ लिखी,
तुम इन्हें अपने अल्फ़ाजों में सुना दो

एहसासों के नग़्में जो बयाँ है किये,
उन्हें तरन्नुम का सरताज़ तो चढ़ा दो

मेरी ख्वाईशें जो जुड़ी है तुमसे,
इन खयालातों को मुकम्मल करा दो

खाली चौखट सी तसवीर जिंदगी,
चुनिन्दा उमंगों के रंगों से खिला दो

कई सवाल उभर आते हैं मन में,
सवालातों के जवाबों का सिला दो

शुरू होती है मेरी जिंदगी तुम से,
मेरी मौत तुम्हारे आगोश में छुपा दो

मेरे जाने पर ना रोना कभी तुम,
गो इस लाश पर इक कफ़न चढ़ा दो

रूहानीयत से सजदा करें हम,
इस रूह को अपने रूह में मिला दो

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
११/०३/१७

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अपना पराया…Apna Paraya…

किसे मैं अपना और किसे पराया समझूँ,
समझूँ किसे अंधेरा और किसे दिया समझूँ ?

कोई दिखे क़ातील,किसे मसीहा समझूँ,
मिलती धूप, किसे सुकून की छाया समझूँ ?

कई दोस्त बन बैठे मुख़ालीफ़, कैसे मैं सहूँ,
तू बता, तुझे हबीब या रक़ीब, क्या समझूँ ?

जो लगता था वहम, बन गया है हकीकत,
एतबार ओ बे एतबारी का भूल भूलैया समझूँ

शमा में जलकर तबाही में जलता परवाना,
नासमझ हूँ जो उसे दरखशां या ज़िया समझूँ

कोशिश करूँ तुझे समझने की, ऐ ग़ालिब,
ना समझ पाऊँ तेरी जुबान, इसे मेरी हया समझूँ

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
०५/०३/१७

पागलखाना…एक नयाअंदाज़ …

Recently I came across an interesting type of gazal wherein each sher was in two languages, but the meter, meaning, kaafia, raadif etc was maintained.

This is an effort on my part to recreate that type of gazal…

पागलख़ाना…

ये दुनिया लगे है जैसे इक पागलख़ाना,
मानवा तू काय जगलास जर हे गुपीत जाणले ना

वाईज़ ओ शेख़ समझ ना पाये ज़माना,
समझदारच जाणे अन म्हणतो यासी पागल खाना

लिख गये वो जनाब फ़ाज़ली ये फ़साना,
म्हणुनी गेले ही दुनिया तर जादूचे खेळणे आहे ना

है यहाँ हर शख्स अजीब सा अनजाना,
घातले सर्वांनी मुखवटे, खरा चेहरा कुठेची दिसेना

ना टूटे किसी का ज़मीर, यही है माना,
विस्कटलेल्या तूकड्यांना जोडतो साकी तुझा घराना

बुतपरस्त होकर ना है मुझे अब जीना,
निष्ठूर रे मानवा तू अंतर्मनात कधीतरी झाक ना

कहूँ इसे बुतखाना,खिलौना या मैखाना,
दुनिये तुझ्या शिल्पकाराला देखील समजेना

न कोई मुझसा मस्तमौला, मुझ में थी अना,
बघूनी विश्वरूप तुझे, नतमस्तक मी तव चरणा

पागलखाना…Pagalkhana…

पागलख़ाना…

ये दुनिया लगे है जैसे इक पागलख़ाना,
वो इन्सान भी क्या जिसने ये राज़ न जाना।

वाईज़ ओ शेख़ समझ ना पाये ज़माना,
समझनेवालों ने जाना ये है इक पागलख़ाना।

लिख गये वो जनाब फ़ाज़ली ये फ़साना,
कह गये दुनिया तो इक जादू का खिलौना।

है यहाँ हर शख्स अजीब सा अनजाना,
सबने पहने मुखौटे, दुनिया लगे बुतखाना।

ना टूटे किसी का ज़मीर, यही है माना,
बिखरे टुकड़ों को जोड़े, साकी तेरा मैखाना।

बुतपरस्त होकर ना है मुझे अब जीना,
पत्थर के इंसान यहाँ, न देखें कभी आईना।

कहूँ इसे बुतखाना,खिलौना या मैखाना,
दुनिया है अफ़साना, लिखने वाला भी समझेना

न कोई मुझसा मस्तमौला, मुझ में थी अना,
जब देखी तेरी मसीहाई हो गयी तुझ पर फ़ना।

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
०२/०३/१७

आप याद आते क्यूँ है…???Aap Yaad Aate Kyun Hai…???

आईने में देख कर आप संवरते क्यूँ है,
हमें जलाने, आप घर से निकलते क्यूँ है?

धीमे कदमों की आहट गुंजती कानों में,
आप शहर की गलीयों से गुजरते क्यूँ है?

नींद से ताल्लुक नहीं इतना सोचूं मगर,
ख्वाब आ कर खयालों में टहलते क्यूँ है?

आपकी यादो को बिंध कर पिरोया मैंने,
फिर इन उम्मीदों के मोती बिखरते क्यूँ है?

गो परवाने शब ए रोज शमा को तरसते,
जुगनू यूँ जलकर शमा में निखरते क्यूँ है?

लिखे फ़लसफ़े मोहब्बत के इन सफहों में,
जिन्हें भूलना चाहू, अक्सर याद आते क्यूँ है?

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
०२/०३/१७

मुझे बेखुदी में जीने दो…Mujhe Bekhudi Main Jeene Do…

मुझे बेखुदी में जीने दो…

बस इतना तो मेरा काम करो,
मुझ पर इक अदना रहम करो,
कभी तो कुछ अच्छा करम करो,
मुझे बेखुदी में जीने दो।

एतबार ओ बे एतबारी में सुलगता रहा,
मुझ पर अब ना कोई सितम करो,
मिली है ख़लिश और ना ज़ुल्म करो,
मुझे बेखुदी में जीने दो।

मैकदे में जिंदगी बिताने मैं चला,
बेहोशी में इन लम्हों को पीने दो,
इस नींद से उठाने का ना जुर्म करो,
मुझे बेखुदी में जीने दो।

मेरा राम तुम, मेरा रहीम भी तुम,
साकी इस मैकदे को दैरो हरम करो,
आज तो तुम मुझ पर ना वहम करो,
मुझे बेखुदी में जीने दो।

आये जो मेरी मय्यत पर दफनाने,
तुम मेरी गोर पर अब ना ग़म करो,
कफ़न चढ़ाओ, अपना काम करो,
अब तो चैन से मरने दो,
मुझे बेखुदी में जाने दो।

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
२०/०२/१७

Madness…

Madness…😊😉😂😍😆

I asked myself one fine day, am I mad ?
Said a voice… a little, better than being sad,
Be a little mad !

Wishing to live in abandon and a will that is free,
Does it make me mad, maybe I am a nomad,
Who is mad !

Exploring risky pathways in the no man’s land,
Remembering the tinge of excitement it had,
Makes me mad.

Loved with heart ‘n soul ‘n wore heart on the sleeve,
If that’s called madness, agreed I am bad,
And I’m mad.

Writing emotions for the whole world to see,
People call me foolish, I am maybe a tad,
A wee bit mad.

I like to live life on my own term’s dearies,
I always did and now I am feeling so glad,
That I’m mad !

When the time comes to leave this illusion of life,
I will not have regrets that I didn’t try out any fad,
Including being mad!

Yes, I am a little mad…I am glad, I am a tad mad…
Yes, I am a little mad…
Better than being bad or sad…

Dr Namrata ‘Mad’ Kulkarni 😊😉😂😍😆
Bengaluru
29/01/17

आज आज़ाद हूँ मैं…Aaj Azad Hoon Main…

आज आज़ाद हूँ मैं…
…A state of extreme emancipation…Is it possible…???

ना दुआ, ना इबादत करूँ,आज आज़ाद हूँ मैं,
ज़ख्मों से सूख गया ये लहू,आज आज़ाद हूँ मैं

मनायी है हिज्र में ईद भी मुहर्रम के मानिंद,
थम गये आँखों से ये आँसू,आज आज़ाद हूँ मैं

मिले चाक दर चाक ज़िगर पर कितने मगर,
फटे पैराहन का कर रफू, आज आज़ाद हूँ मैं

ना कोई उमंग, ना उठती मन में कोई तरंग,
छोड़ीं उम्मीदों की आरज़ू, आज आज़ाद हूँ मैं

सौंधी, गुमसुम, गुमराह, गुमनाम खुशबू जैसे,
इत्र के मानिंद मैं बिखरूँ, आज आज़ाद हूँ मैं

ढूंढता रहा गो हर ग़ाम, हर ड़गर, हर शहर,
खत्म हुई है यहाँ जुस्तजू, आज आज़ाद हूँ मैं

दुनिया के ग़म भुलाने, तोड़ दीये सारे पैमाने,
मैकदे में पहले की है वजू, आज आज़ाद हूँ मैं

या ख़ुदा, आज बिखरा दिये है तसबीह के दाने,
उन्हें समेटने की ना आरजू़,आज आज़ाद हूँ मैं

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
२४/०१/१७

An analysis of the above topic by my friend and philosopher Dr Aditya…

Nice creation Namrata

बुद्धत्व( spiritually enlightened ) को पहुंचा हुआ इंसान, कुछ इसी तरह के अपने विचारों को परिपक्वता तक पहुंचा कर, अपने भौतिक और आध्यात्मिक सफर को विराम देता है।

अब उसके लिये यह धरातल पर जीना, एक समय पसार करने के अलावा कुछ नही होता है।
वो अपने किरदारों को भली भांति और यथा शक्ति निभाते हुए अपना बचा हुआ जीवन व्यतीत करता है।
ना भौतिक जगत में कुछ चाह,
ना ही आध्यात्मिक जगत में कुछ खोजने की इच्छा।
सब पा लिया है, यह भावना।
मन शांत, ना कोई आरजू, ना कोई ज़ुस्तजू ।
एक गहरी शांति।
एक गहरे संतोष का अहेसास।
एक गहरी मुस्कुराहट, दुनिया के सामने और खुदा के सामने।
एक गहरा मौन।
ना कुछ सोचने की जरूरत।
ना कुछ बोलने की जरूरत।
ना कुछ करने की ख्वाइश।
सब कुछ भली भांति,
शांत शांत शांत
अपने अंतरात्मा का अहसास और अपने आप मे खुदा का दर्शन।
सनातन सुख, शांति, आनंद, प्रेम, पवित्रता, ज्ञान, शक्ति, उत्साह, उमंग, करुणा और संतोष की अनुभूति,
जो सिर्फ और सिर्फ महसूस की जा सकती है,
बयाँ नही।
वाह क्या अहेसास और क्या अनुभूति है !!!
निर्णायक अनुकंपा मालिक की अपने बंदे पर।
अंतिम छोर पर अनुग्रहित होना मौला की तरफ से।

इस अनुभूति के हम सभी हक्कदार है,अगर हम कोशिश करे तो,मालिक हम सभीको इस अवस्था पाने के लिये अनुग्रहित करे,यही दुआ करता हूँ।