आग…Aag…

आग…

बातों बातों में यूँ फ़ैल जाती क्यूँ ये,
सरगोशियाँ क़ाबू में ना आती क्यूँ ये ?

अरमानों की धीमी सी है सुलगती,
कभी गलीयों शहरों से गरजती क्यूँ ये ?

मोहब्बत में ज़लवे भी दिखाती ये,
इश्क़ में जलाकर ख़ाक कराती क्यूँ ये ?

इन्सान को इन्सानीयत ना है भाती,
जलने की बूं फ़िजा में बिखराती क्यूँ ये ?

दावाग्नि को सुखे पत्तों सा है फैलाती,
धुएँ के मानिंद रिश्तों को उड़ाती क्यूँ ये ?

तपते धूप में काया को है तरसाती,
पानी की प्यास में बदन तड़पाती क्यूँ ये ?

किसी गरीब के घर चुल्हा ये चलाती,
अमीरों की होलीयों को बहलाती क्यूँ ये ?

इधर माचीस से बीडी को है जलाती,
धगधगती चीता में मुक्ती दिलाती क्यूँ ये ?

गो बातों से भी कभी फ़ैल है जाती,
ये आग, आग को अजीब लगाती क्यूँ ये ?

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु ०८/११/१६

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