कैफ़ियत…Kaifiyat…

जज्बात उभरते तब है, जब ख्वाब अधूरे रह जाये। यादो में जान तब आती है, जब दूरिया बनी रहे। बेबसी में निखार तब आता है, जब ख्वाबों के गर्दिश में हम उलझते है। वाबस्ता( जुड़े रहना विचारो से), नादानिस्ता(बिना अहसास के), दानिस्ता(जानकर), ये सब अवस्था है, जो सिर्फ ये बताती है, की किसी की भावना में भावित होकर, दिन ऐसे गुजरता है, जैसे उसके गुजरने का अहेसास ही नहीं होता। ये गर्दिश,उलजन, ख्वाबो के जहां में बसना, यही सबूत है, की उस शख्स को मोहब्बत है। इस भाव को “गोपी भाव” कहते है। इसी भाव में गोपिया रहती थी कृष्णा की याद में। कुछ इसी भाव में रहते है वो शख्स, जो दूर है उन से, जिससे उन्हें मोहब्बत है।

kaifiyat

Inspired by Gulzar Saab’s Gazal sung by Jagjit ji…Din kuch aaise gujarata hai koi…

 

कैफ़ियत= परिस्थिति

वाबस्ता= connected

दानिस्ता= deliberately

नादान्स्तिा =अज्ञानतावश

 

 

 

 

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