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emotions in poetry…

Hi…

Welcome to my blog which is all about emotions in poetry…my emotions in my poetry…

I have attempted to put my emotions in Hindi…Urdu…Marathi…

There are different kinds of poetry from short and sweet charolis to poems…kavitas and gazals…

Enjoy them all…

Dr Namrata Kulkarni

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ये जरूरी नही मगर…Ye Jaroori Nahi Magar…

Lot of events occur in life where the end result is predictable…But not always…

ये जरूरी नही मगर…

आह को चाहिए ता उम्र होने असर, ये जरूरी मगर,
ऐ ग़ालिब, हर आह करे मुक्कमल असर, ये जरूरी नही मगर

आग़ोश ए सहर में निखरे क़मर, ये जरूरी मगर
शब ए रोज़ शमा करे दरखशां असर, ये जरूरी नही मगर

खंजर करते है जख़्म अकसर, ये जरूरी मगर,
हर ज़हर का ज़ालीम हो असर, ये जरूरी नहीं मगर

ज़फर होती यूँ मुकम्मल गुजर, ये जरूरी मगर,
हर अख़बार ए ख़बर हो ज़बर, ये जरूरी नहीं मगर

दुनिया ए नज़र ना हो बेखबर,ये जरूरी मगर,
बे इरादा होंगी मेरी बेदार नज़र, ये जरूरी नही मगर

दर ओ दर ख्वाब हो मयस्सर, ये जरूरी मगर,
हर सिकंदर बने बादशाह ए अकबर ये जरूरी नही मगर

मंझर में हो तेरी सांसों का अतर, ये जरूरी मगर,
तेरी यादों से दीदा ए तर बन जाये समंदर, ये जरूरी नही मगर

हर डगर की आख़िर हो बसर, ये जरूरी मगर,
हर अंजाम ए सफ़र हो तेरे ही शहर, ये जरूरी नहीं मगर

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
०९/०१/१६

शीश महल…Sheesh Mahal…

इन शीश महलों में बसने वालों,
पत्थरों को संभाल कर उछालो।

लोगों को ना इतने ताने मारों,
घर के क़तरे हो जायेंगे संभालो।

अपने जहन में झाँक कर देखो,
पस ए आईने परछाई को निकालो।

गो पहले अपने ख़ुदा को पहचानो,
खुद को ही वाईज़ समझने वालों।

बड़ा आसान इक उंगली उठाना,
बाकी उंगलियों को मोड़ ना डालो।

कोई नही अच्छा या बुरा जहाँ में,
अंदर के शैतान की कब्र बना लो।

मूसा ओ ईसा को नही छोड़ा जहाँ,
इंसान हो, इंसानियत ना मार डालो।

NK

10/10/17

भावमुद्रा सागरी…Bhavmudra Sagari…

भावमुद्रा सागरी…

सागरी लाटां करती मैत्री किनारी,
कोणं वाली सुरकुत्यांना मुखावरी ?

ओहोटी-भरतीचे चक्र चाले निरंतरी,
भाव येता जाता ओसरती चेहऱ्यावरी।

शिंपल्यात मोती उठून दिसे भारी,
पापण्यांची झालर अश्रुंचे मोती धरी।

हिंदोळ्यां वर डोलते नौका पैलतीरी,
अश्रु तरळी नयनी, घरंगळती गालावरी।

किरणांच्या प्रतीबिंबीत छटा मनोहारी,
आनंद, दु:ख, क्रोध, आस दिसे मुखावरी।

लाल बिंब ते लोपले दूर क्षितिजावरी,
ज्योत विझवुनी उडे मनपाखरू दूरवरी।

शांत लाटा, निश्चल त्या संथ पाण्यावरी,
सरल्या सुरकुत्या परत न येण्यापरी।

अग्निपंख घिरट्या घालतो सागर तीरी,
मन पाखराच्या पिंजऱ्याचे पाश सोनेरी।

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
०१/०१/१७

A Bird’s Eye View…

A bird’s eye view…

A stray thought flew with me in my imagination,
I felt the giddiness of ecstasy, of it’s elevation.

Visualising a birds eye view of the condition,
Puts your life back into the right perception.

Different angles when seen of the same location,
All scenarios are truthful as per viewer’s description.

Good or bad then becomes a relative indication,
Determined by the birds eye view of the situation.

Neither you are wrong, nor am I right on this occasion,
All depends on how the scene leaves it’s impression.

Looking at the larger picture is always a suggestion,
Imagine a bird’s eye view before every expression.

It’s that time of life to do a little Introspection,
Respect all opinions and see them in the right perspection.

I flew with my thoughts deep in contemplation,
Having a bird’s eye view, from a vantage position.

NK
1/10/17

कटी पतंग…Kati Patang…

Life is full of negativity most of the times, it surrounds us in all forms, but still life has to be lived to the best of your ability because god wants you to…Life is a god gift…Live life…

कटी पतंग…

फ़िजा गुमसुम, हवाओं में ना कोई उमंग है, आसमानों में गुमशुदा ये इक कटी पतंग है

चाँद है अकेला शब में सियाह चादर ओढ़े, ये शमा बुझे तो कौन इस परवाने के संग है

लहरें भी साहिल से मिलकर थम गई जैसे, दरिया में ना कोई मौज है, ना कोई तरंग है

तस्सवूर में जो बनायी, गुम हुई वो तसवीर, दिखे खाली चौखट, बिखर गये सारे रंग है

बादलों से झाँकें चाँदनी, जुगनुओं की रक़्स, जिंदगी में ये सुहाने अदना पल मिलते चंद है

ये रूह जब छोड़ जाये इस बेहिस बदन को, कज़ा भी छुने से कतराये, ऐसा हुआ ये अंग है

बिखरे ख़यालात, टूटे जज़्बात,कई सवालात, जखमी घायल रूहों से भरा मैदान ए जंग है

सुनसान राहों पे काफ़िले निकले जनाज़ों के, उठ खड़ी हुयी ये काया जिसे जीना रज़ामंद है

जिंदगी घिरी अंधेरों में, रोशनी भी बेहोश है, गो कोशिश करूँ जीने की, ये खुदा ए पसंद है

डॅा नम्रता कुलकर्णी बेंगलुरु ०९/०१/१७