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emotions in poetry…

Hi…

Welcome to my blog which is all about emotions in poetry…my emotions in my poetry…

I have attempted to put my emotions in Hindi…Urdu…Marathi…

There are different kinds of poetry from short and sweet charolis to poems…kavitas and gazals…

Enjoy them all…

Dr Namrata Kulkarni

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In Your Dreams…

In your dreams…

Though far away n lost I may seem,
Y’ll find me in the world of your dreams.

Like the waves floating on the stream,
Riding the serene rivulets of the moonbeam.

Shining in the sky of hope n’ gleam,
Amongst the dazzling rays of the sunbeam.

The touch of my warm breath’s steam,
Caressing your cheek like soft winter cream.

Lingering fragrances they may seem,
Will fill your heart till it bursts at it’s seams.

Walking on the rainbow searching for me,
Your twinkling guiding star in God’s scheme.

Our love’s surely like a fairy-tale theme,
Bubbling with emotions filled to the brim.

Though it may seem to you like a daydream,
I’ll always be somewhere within your dreams.

Dr Namrata Kulkarni
Bangalore
21/03/17

दे दो साहिब…De Do Saahib…

दे दो साहिब…

मिरे वजूद की निशानी दे दो साहिब,
हर सिम्त अब्र सियाही, ताबानी दे दो साहिब

उम्र की दहलीज़ पर हुए है दाना,
फ़िर मुझे बचपन की वो नादानी दे दो साहिब

जिंदगी में है पशेमानी ओ वीरानी,
लुत्फ़ उठता चलूँ, मुझे जिंदगानी दे दो साहिब

ना दिखे मिरे इश्क़ की नातवानी,
मुझे मिरी मोहब्बत की दरबानी दे दो साहिब

प्यार में याँ लगती दिल पे निशानी,
मिरे ज़ीगर की मुझे निग़हबानी दे दो साहिब

तुम करो बस इतनी सी मेहरबानी,
समेटकर खुशी, हमें बेपरेशानी दे दो साहिब

बिखरी दूरतक जो निले आसमानी,
ऐ चाँद, तुम्हारी सुहानी चाँदनी दे दो साहिब

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
१४/०३/१७

रंग प्रेमाचे…Rang Premache…

थोडासा रूमानी हो जाये …

रंग प्रेमाचे…

तुझ्या रंगात रंगले मी,
नात्यात ह्या गुंतले मी।
भरले प्रीतीचे रंग तुझे,
माझ्या श्वेत तसबीरीत मी।

मेंदीच्या पानांनी रंगली,
हातावर लाली ही सजली।
करी मंजुळ नाद मनगटी,
हिरवा चुडा भरलेला मी।

विड्याचे पान गालात,
ओठावर उमले गुलाली।
काळ्या भोर मेघ केशातून,
चांदणी फुले माळीली मी।

बकुळीहार निळकंठी,
डोले पलशाची कर्णफूली।
रंगात रंगवूनी मज तू,
रंगून झाली पितांबरी मी।

श्वेतांबरी मी होती कधी,
सप्तरंगी इंद्रधनु झाले मी।
तुझ्या प्रेम रंगात रंगूनी,
रंग उधळीत गेले मी,
मलाच विसरूनी गेले मी।

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
१३/०३/१७

Disclaimer: the picture used is one of Raja Ravi Verma paintings, solely for the purpose of depicting the emotions. No copy right intended.

बस इतना कर दो…Bas Itna Kar Do…

बस इतना कर दो…

मैं हूँ इक उलझा अदना सा लम्हा,
तुम मेरे रूठे हालात को सुलझा दो

कोरे सफ़हे पर खामोशीयाँ लिखी,
तुम इन्हें अपने अल्फ़ाजों में सुना दो

एहसासों के नग़्में जो बयाँ है किये,
उन्हें तरन्नुम का सरताज़ तो चढ़ा दो

मेरी ख्वाईशें जो जुड़ी है तुमसे,
इन खयालातों को मुकम्मल करा दो

खाली चौखट सी तसवीर जिंदगी,
चुनिन्दा उमंगों के रंगों से खिला दो

कई सवाल उभर आते हैं मन में,
सवालातों के जवाबों का सिला दो

शुरू होती है मेरी जिंदगी तुम से,
मेरी मौत तुम्हारे आगोश में छुपा दो

मेरे जाने पर ना रोना कभी तुम,
गो इस लाश पर इक कफ़न चढ़ा दो

रूहानीयत से सजदा करें हम,
इस रूह को अपने रूह में मिला दो

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
११/०३/१७

अपना पराया…Apna Paraya…

किसे मैं अपना और किसे पराया समझूँ,
समझूँ किसे अंधेरा और किसे दिया समझूँ ?

कोई दिखे क़ातील,किसे मसीहा समझूँ,
मिलती धूप, किसे सुकून की छाया समझूँ ?

कई दोस्त बन बैठे मुख़ालीफ़, कैसे मैं सहूँ,
तू बता, तुझे हबीब या रक़ीब, क्या समझूँ ?

जो लगता था वहम, बन गया है हकीकत,
एतबार ओ बे एतबारी का भूल भूलैया समझूँ

शमा में जलकर तबाही में जलता परवाना,
नासमझ हूँ जो उसे दरखशां या ज़िया समझूँ

कोशिश करूँ तुझे समझने की, ऐ ग़ालिब,
ना समझ पाऊँ तेरी जुबान, इसे मेरी हया समझूँ

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
०५/०३/१७

पागलखाना…एक नयाअंदाज़ …

Recently I came across an interesting type of gazal wherein each sher was in two languages, but the meter, meaning, kaafia, raadif etc was maintained.

This is an effort on my part to recreate that type of gazal…

पागलख़ाना…

ये दुनिया लगे है जैसे इक पागलख़ाना,
मानवा तू काय जगलास जर हे गुपीत जाणले ना

वाईज़ ओ शेख़ समझ ना पाये ज़माना,
समझदारच जाणे अन म्हणतो यासी पागल खाना

लिख गये वो जनाब फ़ाज़ली ये फ़साना,
म्हणुनी गेले ही दुनिया तर जादूचे खेळणे आहे ना

है यहाँ हर शख्स अजीब सा अनजाना,
घातले सर्वांनी मुखवटे, खरा चेहरा कुठेची दिसेना

ना टूटे किसी का ज़मीर, यही है माना,
विस्कटलेल्या तूकड्यांना जोडतो साकी तुझा घराना

बुतपरस्त होकर ना है मुझे अब जीना,
निष्ठूर रे मानवा तू अंतर्मनात कधीतरी झाक ना

कहूँ इसे बुतखाना,खिलौना या मैखाना,
दुनिये तुझ्या शिल्पकाराला देखील समजेना

न कोई मुझसा मस्तमौला, मुझ में थी अना,
बघूनी विश्वरूप तुझे, नतमस्तक मी तव चरणा

पागलखाना…Pagalkhana…

पागलख़ाना…

ये दुनिया लगे है जैसे इक पागलख़ाना,
वो इन्सान भी क्या जिसने ये राज़ न जाना।

वाईज़ ओ शेख़ समझ ना पाये ज़माना,
समझनेवालों ने जाना ये है इक पागलख़ाना।

लिख गये वो जनाब फ़ाज़ली ये फ़साना,
कह गये दुनिया तो इक जादू का खिलौना।

है यहाँ हर शख्स अजीब सा अनजाना,
सबने पहने मुखौटे, दुनिया लगे बुतखाना।

ना टूटे किसी का ज़मीर, यही है माना,
बिखरे टुकड़ों को जोड़े, साकी तेरा मैखाना।

बुतपरस्त होकर ना है मुझे अब जीना,
पत्थर के इंसान यहाँ, न देखें कभी आईना।

कहूँ इसे बुतखाना,खिलौना या मैखाना,
दुनिया है अफ़साना, लिखने वाला भी समझेना

न कोई मुझसा मस्तमौला, मुझ में थी अना,
जब देखी तेरी मसीहाई हो गयी तुझ पर फ़ना।

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
०२/०३/१७

आप याद आते क्यूँ है…???Aap Yaad Aate Kyun Hai…???

आईने में देख कर आप संवरते क्यूँ है,
हमें जलाने, आप घर से निकलते क्यूँ है?

धीमे कदमों की आहट गुंजती कानों में,
आप शहर की गलीयों से गुजरते क्यूँ है?

नींद से ताल्लुक नहीं इतना सोचूं मगर,
ख्वाब आ कर खयालों में टहलते क्यूँ है?

आपकी यादो को बिंध कर पिरोया मैंने,
फिर इन उम्मीदों के मोती बिखरते क्यूँ है?

गो परवाने शब ए रोज शमा को तरसते,
जुगनू यूँ जलकर शमा में निखरते क्यूँ है?

लिखे फ़लसफ़े मोहब्बत के इन सफहों में,
जिन्हें भूलना चाहू, अक्सर याद आते क्यूँ है?

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
०२/०३/१७

मुझे बेखुदी में जीने दो…Mujhe Bekhudi Main Jeene Do…

मुझे बेखुदी में जीने दो…

बस इतना तो मेरा काम करो,
मुझ पर इक अदना रहम करो,
कभी तो कुछ अच्छा करम करो,
मुझे बेखुदी में जीने दो।

एतबार ओ बे एतबारी में सुलगता रहा,
मुझ पर अब ना कोई सितम करो,
मिली है ख़लिश और ना ज़ुल्म करो,
मुझे बेखुदी में जीने दो।

मैकदे में जिंदगी बिताने मैं चला,
बेहोशी में इन लम्हों को पीने दो,
इस नींद से उठाने का ना जुर्म करो,
मुझे बेखुदी में जीने दो।

मेरा राम तुम, मेरा रहीम भी तुम,
साकी इस मैकदे को दैरो हरम करो,
आज तो तुम मुझ पर ना वहम करो,
मुझे बेखुदी में जीने दो।

आये जो मेरी मय्यत पर दफनाने,
तुम मेरी गोर पर अब ना ग़म करो,
कफ़न चढ़ाओ, अपना काम करो,
अब तो चैन से मरने दो,
मुझे बेखुदी में जाने दो।

डॅा नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
२०/०२/१७