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emotions in poetry…

Hi…

Welcome to my blog which is all about emotions in poetry…my emotions in my poetry…

I have attempted to put my emotions in Hindi…Urdu…Marathi…

There are different kinds of poetry from short and sweet charolis to poems…kavitas and gazals…

Enjoy them all…

Dr Namrata Kulkarni

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तेरे माथे पर बिंदिया का…Tere Mathe Par Bindiya Ka…

Have a romantic Valentine’s day💖💞💕❤…

तेरे माथे पर बिंदिया का ताब चमके,
जैसे रुख़सार ए आसमान पे आफ़ताब चमके

तेरा हुस्न ए नूर बहुत लाजवाब साकी,
आरिज़ ए गुल पे तिल, ज़र ए नक़ाब चमके

ज़ुल्फ़ ए सियाह का चिलमन जब उठे,
उन घने बादलों में चांदनी का माहताब चमके

सीपियों के पंखुड़ियों में निखरे गौहर,
शबनमी होठों पर आँसूओं का आब चमके

दरिया में डूब जाऊँ, या बचा ले मुझको,
ये गहरे समंदर निगाह ए शोख़ बेताब चमके

तुझे देख कर न रहे खुशियों का पैमाना,
चश्म ए नम से गिरते आँसू बेहिसाब चमके

तू दिखे रु ब रु, या बेख़ुदी के ख़यालों में,
तेरा अक्स जब छलके, जाम ए शराब चमके

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु

मौला के बंदे…Maula Ke Bande…

मौला के बंदे…

बेख़ुदी में पीते अक्सीर ए हयात की बूंदे,
मिले जब तेरे बज़्म ऐ साकी, कहलाते हम रिंदे

ना है धरम ओ ईमान, ना ही कोई मज़हब,
आज़ादी के नशे में सरहद से परे उड़ते हुए परिंदे

ज़ाहिद निकलता दर ए मस्ज़िद से नमाज़ी हो कर,
जब हम निकले ख़राबात से, लोग कहते दरिंदे

कभी इज्ज़त ना दी इस ज़ालिम ज़माने ने,
फ़िर भी करें एहतराम सबका, ना कहो हमें चरिंदे

रहते नज़्म ओ शायरी की दुनिया में मक़फूल,
कूचे गलीयों में, शहरो आलम के पोशीदा बाशिंदे

ना इरादें, ना उमंगे, ना है ख़फ़ीफ उम्मीदें,
तवक्कों से हुए बरबाद, कहो हमें मौला के बंदे

शर्म, ‘हया’, लिहाज़ रखो बतलाये वाईज़,
पीते ग़म भुलाने को, क्यूँ कहलाये शर्मिन्दे

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु, २६/०४/१७

Disclaimer:

Image used only for purpose of representing the feel of the gazal, no intention of copyright intended.

निकले थे घर से…Nikale The Ghar Se…

निकले थे घर से जाने कलिसे की ओर,
क़दम चल पड़े ना जानें क्यों, कहीं ओर

अजनबी मंजिलें ओ मुक़ाम दिखे रहगुज़र,
कश्मकश दिल में यहाँ जाऊँ, या कही ओर

कई हसरतें, कई उम्मीदें, ख़यालात मेरे,
ख्वाबों की सिंम्त मुख़्तलिफ़,मैं किसी ओर

बोझल ये ज़िगर, करूँ इसे हलका किधर,
रिन्दे बुलाये, हम चल पड़े, मैकदे की ओर

बेख़ुदी बसें जहाँ, ना है तफ़ावुत जिधर,
पहूँचे आख़िर मक़ाम पे, ए साकी, तेरी ओर

कहाँ से आगाज़, कहाँ मआल ए सफ़र,
निकले थे ‘हया’ से फैसला किये, कलिसे की ओर

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरू
२४/०४/१७

गो दुआ मेरी…Go Dua Meri…

Loved and lost …???💔

गो दुआ मेरी बे असर ना थी,
पर जिंदगी में यूँ सबर ना थी

काँटों की कभी चाह ना थी,
गुलों से सजी रहगुज़र ना थी,

मेरे चश्म जहाँ नम ना हुए,
मोहल्ले की कोई दर ना थी

तू याद ना आये इक लम्हा,
ऐसी ये दियार ए सहर ना थी

मेरे अश्क़ों में तू यूँ थम गयी,
तुझे कभी मेरी क़दर ना थी

निगाह ए चश्म ए दिल में थी,
गो तेरी नज़र को ख़बर ना थी

मेरे जिगर के यूँ टूकड़े करें,
तेज़ इतनी कोई खंज़र ना थी

दश्त दर दश्त मैं ढूंढता रहा,
कफ़न से ओढ़ी क़बर ना थी

लिहाज़ ए शरम, फ़िकर ना थी
“हया” मुझे भी अकसर ना थी

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
२२/०४/१७

नक़ाबों के पीछे से…Naqaabon Ke Peeche Se…

Every veil secretly desires to be lifted, except the veil of Hypocrisy…

Every woman in all cultures wears one knowingly or unknowingly…seen or unseen…

नक़ाबों के पीछे से…

रोज़ देखूँ दुनिया चमकती नक़ाबों के पीछे से,
चश्म ए नम से गुज़रती देखती, नक़ाबों के पीछे से

लबों की लरझिश, हल्की इक आह निकले,
हुआ दीदार ए यार तो शरमाती, नक़ाबों के पीछे से

आँखों की सीपियों से गौहर झलकते है कभी,
हलके हाथों से पिरोया करती, नक़ाबों के पीछे से

मन करता है मेरा चिलमन उड़े बाद ए सबा में,
गो ग़म ए हस्ती को छुपाती नक़ाबों के पीछे से

मेरे अरमान, ख्वाबों ख़यालात,लिखे नग़मात,
कैफ़ की बरसात मुझे भिगोती, नक़ाबों के पीछे से

लूँ मैं भी आज़ादी की साँसे किसी इक दिन,
घुटन मुझे भी कभी है होती, नक़ाबों के पीछे से

शरम, लिहाज़, “हया” रखा करो कहते वाईज़,
क्या ये सब अछूत ही रहती, नक़ाबों के पीछे से ?

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
२३/०४/१७

आज आज़ाद हूँ मैं…Aaj Azaad Hoon Main…

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं🙏🏻🇮🇳 आज आज़ाद हूँ मैं…

ना मैं हिन्दू,ना मैं मुसलमान, आज आज़ाद हूँ मैं,
ना कोई धरम, यही मेरा इमान, आज आज़ाद हूँ मैं।

कई बरसों पहले कफ़स में हुआ था मैं बेजान,
फिर न जकड़ तू मुझे इन्सान, आज आज़ाद हूँ मैं।

भगतसिंह,राजगुरु,सुखदेव के लहू का एहसान,
न चाहिए अब कोई कद्रदान, आज आज़ाद हूँ मैं।

बंद करो दंगे फ़साद, मज़हब के नाम इन्कलाब
बस इतने हो जाओ मेहरबान, आज आज़ाद हूँ मैं।

ज़कत है सिखाना, न करो अबला का अपमान,
यही है मेरा अब से अरमान, आज आज़ाद हूँ मैं।

आज़ादी की सांस मुझे लेने दो,मुझे भी जीने दो,
ना लो अब मेरा यूँ इम्तीहान, आज आज़ाद हूँ मैं।

NK

दरमियान…Darmiyan…

दरमियान…

दरमियान ए ख़याल ओ आवाज़ हो रहा बसर मेरा,
पक गया है फ़ल शायद मेरे जिंदगी के शजर मेरा

सुबह ओ मासा दिये आवाज़ ए ख़ामोश ए ज़मीर,
इबादतों जुनून में किये सज़दे न मीला मुझे समर मेरा

गुजर रही है शाम ए जिंदगी, हो कर यूँ सरशर,
मैं नशे में, नशा मय में, मय से भरा है साग़र मेरा

कश्मकश है याँ दिन बा दिन अक़्ल ओ जुनूँ की,
ऐतबार ओ बे ऐतबारी में उलझता मुक़द्दर मेरा

दरमियान ए वजूद ओ अदम रहता शब ओ सहर,
शहर भी छोड़ आया हूँ साकी, तेरा संग ए दर मेरा

मेरे अतराफ़ को कर तेरे जमाल ए नूर से रोशन,
हो हर सिम्त उजाला, ख्वाईश ओ इज़हार मेरा

तेरे ज़मीन पे ज़ुर्रत करती लिखने की ऐ ग़ालिब,
बन पाऊँ शायर सुख़नवर ये इक़रार, अकसर मेरा

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
२१/०४/१७

In between…

I continue to exist between my thoughts and voice,
Probably I have (fruit of the tree of my life has matured) reached a ripe old age in life.

Morning and evening praying with the silent voice of my soul,
Praying zealously without hope of rewards on the whole

Now the evening of life goes by in a state of intoxication,
I am drunk due to the wine in my glass of inebriation
(drunk with wine of devotion towards almighty)

Daily there is a fight between sense and senselessness,
When my destiny fluctuates between belief n’ hopelessness

I am living between state of existence and nonexistence,
Came to you saaqi(god) for shelter, from afar distance

Illuminate my surroundings with the beautiful brilliance of your light,
My last wish and request to make my world bright

I dare to write in your birthland O ghalib, the great,
Determined and hoping to become an eloquent poet.

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
२१/०४/१७

बिखरे तसबीह के दाने…Bikhare Tasbeeh Ke Daane…

बिखरे तसबीह के दाने…

खड़ी पलकों के पीछे, अश्क़ों की ये क़तारें,
टीप् टिप बरस कर बिखरे रुख़सार से परे,
जैसे तसबीह के दाने…

गोते लगाकर समेटती जिन्हें दरिया की आगोश में लहरें,
सीपियों के गौहर ए शफ़्फ़ाफ़ समंदरों में बिखरे,
जैसे तसबीह के दाने…

डूब गया आफ़ताब जब दूर उफ़क के किनारे,
टूटकर बिखरे नीले आसमानी बादलों में सितारे,
जैसे तसबीह के दाने…

पेड़ों की शाखों ने ओढ़ ली पत्तों की चादरें,
गुलों पर शबनम के दिखे बिखरे हुए क़तरे,
जैसे तसबीह के दाने…

नज़र ढूँढे दश्त दर दश्त सराबों के नजारे,
मुश्त ए ख़ाक ए सहरा में बीते लम्हों के टुकरे,
जैसे तसबीह के दाने…

अब ना समेटूँ उन्हें, करूँ इबादत दिल में मिरे,
ढूँढ़कर सजदे की वजह बेशुमार, आस्तान पे तेरे,
जैसे तसबीह के दाने…

बिखरने दो तसबीह को, तोड़ दो जुन्नार मिरे,
मोहोब्बत ओ जुनून में किये इबादत
ता उम्र बा हजाराँ तेरे,
जैसे तसबीह के दाने…

ऐ खुदा, समेट लेना तू इन बेबस मुरादों को मिरे,
बिंध कर पिरोदे मिरे जज़बात जो हर सिम्त है बिखरे,
जैसे तसबीह के दाने…

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु