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emotions in poetry…

Hi…

Welcome to my blog which is all about emotions in poetry…my emotions in my poetry…

I have attempted to put my emotions in Hindi…Urdu…Marathi…

There are different kinds of poetry from short and sweet charolis to poems…kavitas and gazals…

Enjoy them all…

Dr Namrata Kulkarni

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बिखरे तसबीह के दाने…Bikhare Tasbeeh Ke Daane…

बिखरे तसबीह के दाने…

खड़ी पलकों के पीछे, अश्क़ों की ये क़तारें,
टीप् टिप बरस कर बिखरे रुख़सार से परे,
जैसे तसबीह के दाने…

गोते लगाकर समेटती जिन्हें दरिया की आगोश में लहरें,
सीपियों के गौहर ए शफ़्फ़ाफ़ समंदरों में बिखरे,
जैसे तसबीह के दाने…

डूब गया आफ़ताब जब दूर उफ़क के किनारे,
टूटकर बिखरे नीले आसमानी बादलों में सितारे,
जैसे तसबीह के दाने…

पेड़ों की शाखों ने ओढ़ ली पत्तों की चादरें,
गुलों पर शबनम के दिखे बिखरे हुए क़तरे,
जैसे तसबीह के दाने…

नज़र ढूँढे दश्त दर दश्त सराबों के नजारे,
मुश्त ए ख़ाक ए सहरा में बीते लम्हों के टुकरे,
जैसे तसबीह के दाने…

अब ना समेटूँ उन्हें, करूँ इबादत दिल में मिरे,
ढूँढ़कर सजदे की वजह बेशुमार, आस्तान पे तेरे,
जैसे तसबीह के दाने…

बिखरने दो तसबीह को, तोड़ दो जुन्नार मिरे,
मोहोब्बत ओ जुनून में किये इबादत
ता उम्र बा हजाराँ तेरे,
जैसे तसबीह के दाने…

ऐ खुदा, समेट लेना तू इन बेबस मुरादों को मिरे,
बिंध कर पिरोदे मिरे जज़बात जो हर सिम्त है बिखरे,
जैसे तसबीह के दाने…

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु

इस गली…Is Gali…

reminiscences of a bygone era…

इस गली…

तेरे हुस्न के देखे थे लाखों दीवाने इस गली,
इक शमा नज़र में,जले थे कई परवाने इस गली

याद है, बैठा किये थे उस बरगद की छाँव में,
पेड़ ना रहे, पीछे रह गए अफ़साने इस गली

ना रहा वो नुक्कड़, ना रहे वो आशियाने,
हो गये सब ख़ाक, जो भी थे पुराने इस गली

अब ना है इक धरम, ना किसीका इमान,
ता हद्द ए नज़र खाली दिखे बुतखाने इस गली

दिखे मस्ज़िद ए वीरान, तकब्बुर मीनारें रोती हुई,
वक़्त की शाख पे जैसे ठहरे हो जमाने इस गली

मेरी प्यास अब ना बुझेगी इक पैमाने से साक़ी,
ख्वाइश है हर कूचे पर हो कई मैखाने इस गली

कुछ ना रहा है देखने, ना रहा कुछ समझने,
बन गए है अब तो हम भी अनजाने इस गली

हुई इक मुद्दत के तू गुज़र गया है ग़ालिब,
गूंजते तेरे लफ्ज़ आज भी जाने पहचाने इस गली

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरू
१७/०४/१७

तकब्बुर proud

जुनून ए मुहब्बत…तू…Junoon E Muhabbat…Tu…

जुनून ए मुहब्बत…💕
तू…

तू है अज़ान, तू ही वजू, तू ही इबादत मिरी,
तू है दुआ, तू ही सजा, तू ही है आयात मिरी

तू है ताबीज़, तू ही तसबीह, तू मिली सौग़ात,
तू खयालात, तू जज़्बात,बन गयी नग़मात मिरी

तू किस्मत, ना दिया खैरात, तू ही कायनात,
तू फ़िजा, तू समा, तुम हो गयी हो हयात मिरी

तू है हश्र, तू मुलाकात, मेरी यादों की बारात,
तू तिश्नगी, तू ही बरक़त, तू ही है बरसात मिरी

तू नज़ाकत, तू कयामत, तू ही मिरी रिवायत,
तू मोहब्बत, मिरी ज़रूरत, इक हसीन रात मिरी

तू क़ुदरत,मेरी फ़ुरसत, हो तुम इल्तिफ़ात,
तू इज्ज़त, तू ही फ़ितरत, बन गयी आदत मिरी

मोहब्बत बन गयी बन्दगी, क्यों करे शिकायत,
ना कर अब रक़ाबत, तू है खुदा की रहमत मिरी

तू है मेरी बग़ावत, मेरी जिन्दगी की गफ़लत,
तू बन गयी अल्लाह की इनायत, कहूँ बात मिरी

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
१६/०४/१७

जिंदगी की तेज रफ़्तार में…Jindagi Ki Tej Raftar Main…

Good morning😊…When life throws brick bracks at you…Build a house… enjoy my perception of life and society.. .

जिंदगी की तेज़ रफ़्तार में, कदम आहिस्ता रखना,
अपने नुत्का-चीनों से नाता तू दानिस्ता रखना

जब नज़र आये हर सिम्त घोर घने अंधेरे बादल,
घर के किसी कोने में एक दिया जलता रखना

हर गाम ओ कूचे गली दिखे बंजर वीरान सहरा,
आंगन में गुलो गुलफ़ाम ना सही, दरीचे में गुलदस्ता रखना

यहाँ मुज़रिम हर शक़्स, मुंसिफ़ भी वही,
ना कर ज़ुर्म, ना जुर्म करने वाले से कोई वाबस्ता रखना

गो आते जाते है याँ कई काफ़िर ओ फ़कीर,
अपने संग ए दिल को मोम के मानिंद पिघलता रखना

आती जहाँ गद्दारी ओ लाचारी की बदबू,
सच्चाई, नेकी ओ ईमान से फ़िजा को महकता रखना

मस्ज़िद नमाजियों के लिये, कलिसों में पंडित,
ख़ुदा को तू बस अपने घर का पता तो बता रखना

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
२८/१२/१७

सफ़र…Safar…

“हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले”

सफ़र…

उम्र का सफर रेल गाड़ीयों की तरह,
ख़्वाब सूने खड़े रहते वाँ उन पेड़ों की तरह

कभी ये उमंगे होती चंचल ग़जालों सी ,
भागती क्यूँ दूर हमसे इन ख़यालों की तरह

दिलो दिमाग़ की कश्मकश चले पैहम,
जैसे ख्वाहिशें मंडराती उन तूफ़ानों की तरह

कश्तीयाँ चले उम्मीदों के बादबानों से,
साहील से मिलने बेताब उन लहरों की तरह

देते हो नसीहत तुम आयात के मानींद,
फिर भी हो पुर-असरार किताबों की तरह

बा हजारां इश्तियाक़ न होती मुक़म्मल,
नज़र आती दश्त में उन सराबों की तरह

ये मख़्फी तव्वकों यादों के कफ़न में,
वाँ भी उठ रहा धुआँ बुझती चिताओं की तरह

ये किस बदनसीब की गोर या ख़ुदा ?
दिखे बंज़र ओ वीरान बे मुक़म्मल मुरादों की तरह

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलूरु
११/०४/१७

सवाल…Sawaal…

सवाल…

ज़हन में उठते शब ओ रोज़ कई ऐसे सवाल,
क्यूँ होती जिंदगी कभी निहाल, कभी मलाल ?

यूँ ही गुजरते जाते है ये दिन, माह ओ साल,
ये लम्हे होते कभी इक़बाल, तो कभी बेहाल

तकलीफ़े सताती जैसे लकड़ी में बसे वबाल,
कुतर कुतर के रूह को खाते क्यूँ ये खयाल ?

सुकून सी थी जिंदगी, जो बन गयी है बवाल,
ना हो ज़वाब जिनके, उठते क्यूँ ऐसे सवाल ?

भरे बाज़ार करते सौदा, गो जिस्म है ज़वाल,
बिकते याँ ईमान, खरीदने वाले भी है कमाल

जिंदगी में मिलेंगे हर दाम पर ऐसे ये दलाल,
देख फ़िर निकले शेख़, बा वज़ू होकर, बेमिसाल

मत उलझ सवालातों में जो सीने में लाते उबाल,
कहाँ ढूँढे जवाबात जो ना हो फ़कत ज़लाल,

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
२९/०३/१७

कायापालट… Kayapalat…

End of another year…Getting rid of accumulated negativity and treading new paths in search of positivity…

Wishing you all a happy new year…May all your aspirations and wishes get fulfilled 🙏🙏🙏

Also praying for a friend fighting for his life…🙏🙏🙏

कायापालट…

वर्षा अखेर,आठवणींच्या गदारोळात मी,
एकला चाललो बांधून त्यासी डोईवर गाठोड्यात मी।

विखुरलेल्या भावना, जशा त्या चांदण्या,
एकटाच तिमिरात निशाचर, त्यांना वेचीत मी।

शरण आलो साक़ी मैखान्यात तुझ्या या,
जिथे साग़रात मद्य, मद्यात नशा, नशेत मी।

दे मज आश्रय आज ह्या एकच रातीला,
होता भोर मग जाईन मिहीरा संगे परत मी।

अरुणोदया संगे शोधीन नव दिशा, अनोख्या वाटा,
शृंगारलेल्या किरणालंकृत सुर्योदयात मी।

फाडून सगळे जुने प्राक्तन्नांचे नकाशे विखुरले,
पाऊल खुणांनी जन्मलेल्या पायवाटेवर चाललो धुंदीत मी।

डॉ नम्रता कुलकर्णी
बेंगलुरु
३१/१२/१७

ऐ ग़ालिब…Aye Ghalib…

My tribute to one of the great poets in urdu on his birth anniversary…🍃🍂🌾🍁☘ ऐ ग़ालिब, तेरे कद ए सुख़न के तो नही बराबर,
गो ज़ुर्रत करती लिखने की, हूँ इक नाचीज़ शायर

तू गया अफ़साने जिंदगानी के ऐसे लिख कर,
मैं तो बन ना पाऊँ याँ तेरे जैसी शायर सुख़नवर

एक दिन मुक्कमल हो जायेगा मेरा ये सफ़र,
जब कहेंगे लोग मुझे, है ये ग़ालिबन शायर जफ़र

‘हया’ से लिखूँ इश्क़ के फसाने तेरे ज़मीन पर,
कोशिश करती हूँ कुछ तेरे अ’शआरों को समझकर

डॉ नम्रता ‘हया’ कुलकर्णी
बेंगलुरू १२/०५/१७